अल्लाह का कलमा ही कभी एक नहीं रहा देखें |

 

|| इसलाम का कलमा कभी भी एक नहीं रहा ||

इसलामी मान्यतानुसार अल्लाह ने दुनिया बनाई, जब की यह सत्य नहीं है, अनेक प्रमाण दुनिया में देखने से पता लगता है और लगेगा भी |

पहली बात तो यह है की अल्लाह परिवर्तन शील है, अल्लाह कभी भी एक बात पर निही टिकते कभी कुछ कहते हैं और कभी कुछ, अल्लाह को यह जानकारी भी नहीं है की जो बात कही गई उसे बदलना भी पड़ सकता है यह भी अल्लाह को ज्ञात नहीं है |

 

जिस अल्लाह को विशेष कर इसलाम वाले सृष्टि कर्ता मानते हैं, यह कितना असत्य है देखें | अगर अल्लाह सृष्टि बनाने वाले होते तो अल्लाह को अपना ज्ञान बदलना नहीं पड़ता | और ना कलमा बदल बदल कर देना पड़ता | और ना कभी सहिफा के रूप में और कभी किताब की शक्ल में बदलना पड़ता, कभी तौरैत, कभी जबूर, और कभी इन्जील, फिर कुरान यह देना नहीं पड़ता जिसे लोग ज्ञान कहते हैं | पहली किताब अल्लाह की दी हुई उसे बदल कर दूसरी, और तीसरी चौथी किस लिए देना पड़ता यही है ज्ञान की कमी, एक बात कहकर उसे बदलना यह अच्छे इन्सान का भी कार्य नहीं है जो अल्लाह ने किया हैं |

 

अल्लाह अगर दुनिया बनाने वाले होते तो मानव मात्र को एक प्रकार का ज्ञान देते समय समय पर नहीं किन्तु सृष्टि के प्रथम में ही ज्ञान देते मानव मात्र के लिए, जैसा की वेद है | जो आदि सृष्टि से है, अपरिवर्तनीय है, मानव मात्र के लिए है, सृष्टि नियम के विरुद्ध नहीं है |

 

इसे हम इस प्रकार समझ सकते हैं, सृष्टि के जो नियम है वह यह है की, किसी भी पेड़ को ले सकते हैं, जैसा आम, जो अनेक प्रकार के होने पर भी उस आम के पेड़ में इमली नहीं लगते | यह है ईश्वरीय नियम ईश्वरीय व्यवस्था सृष्टि नियम इसे कहते हैं |

 

इमली के पेड़ में कभी आम नहीं फलेंगे, भले ही आप दोनों को एक ही जगह लगायें, मिटटी वही है मिटटी अपना गुण दोनों को बराबर दिया, फिरभी दोनों फल के स्वाद में अन्तर आ गया | यह पेड़ बड़ा है छोडिये इसे, कोई भी छोटा पेड़ लें, जैसा मिर्च, और धनिया, कोई भी किसी को भी देखा जा सकता है सब के गुण अलग अलग ही है एक दुसरे के गुण को नहीं ले सकता और ना बदल सकता है |

 

तो फिर अल्लाह को अपना ज्ञान बदल बदल कर देना क्यों पड़ा- नबी या पैगम्बर बदल बदल कर भेजना क्यों पड़ा, इससे स्पष्ट हो गया की अल्लाह ना तो दुनिया बनाई और ना ही अल्लाह का दिया ज्ञान कुरान हो सकता है|

 

हम मानव कहलाने के कारण हमें इनके एक एक शब्द पर विचार करना चिन्तन व मनन करना जुरुरी हो जाता है | जिसे ईश्वरीयज्ञान कहा जा रहा है अथवा माना जा रहा है, क्या सही में यह ईश्वरीय ज्ञान है,इसे परखने की क्या कसौटी है और किसके पास हैं ?

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सही पूछिए ता यह कसौटी सिर्फ और सिर्फ मानव कहलाने वालों के पास है अगर कोई परखना चाहे तो | कारण परमात्मा ने हमें ज्ञान दिया है विवेकी बनाया है केवल इसी बुद्धि के आधार पर ही हमारा नाम मानव पडा   धरती पर जितने भी प्राणी हैं जिसमें हम मानव ही एक श्रेष्ठ प्राणी कहलाये, तो यह जिम्मेदारी भी हमारी हुई |

 

किसी भी चीज को परखने का, जब हम इस बात को मानते हैं की हम मानव होने के कारण हमारा सारा काम विचार पूर्वक होना चाहिए | तो क्या ईश्वरीय ज्ञान को हमें परखना नहीं चाहिए ?

 

अगर तर्क के कसौटी पर जो खरा ना उतरे, जहाँ सृष्टि नियम विरुद्ध बातें हों विज्ञान विरुद्ध बातें हो उसे ईश्वरीय ज्ञान मान लेना चाहिए ? फिर इस ज्ञान का प्रयोग कहाँ करेंगे, क्या हमें आँख बन्द कर किसी के कहने पर किसी भी ग्रन्थ को ईश्वरीय ज्ञान मानलेना चाहिए ?

 

तो हमारी वह अक्लमंदी कहाँ चली गयी जिस के लिए हम दम भरते हैं, और मानव होने का अधिकार भी जताते हैं ? जरा दिमाग से सोचें इस कुरानी आयत में अल्लाह ने शिर्क करने वालों को उपदेश दिया की यह शिर्क, अर्थात मैं अल्लाह हूँ और मेरे साथ किसी को मत जोड़ना या मेरे नाम से किसी को भी शरीक ना बनाना |

 

यह अल्लाह कह रहे हैं जो अल्लाह प्रथमसे अपने नामों में कई नबियों का नाम जोड़ा है, जैसा लाइलाहा इल्लालाल्लाह आदम नबी अल्लाह {आदम अल्लाह के नबी}

 

इस प्रकार मात्र नमूना दे रहा हूँ, प्रायः नबी और रसूल के नाम के साथ अल्लाह का नाम जुड़ा हुवा है | यह बदलते गये नबी के साथ अल्लाह का भी नाम जुड़ता चला गया, आदम नबी अल्लाह | जो आये उसी के नाम अल्लाह के नाम के साथ जोड़ दिया गया | ला इलाहा इल्लाल्लाह इसका अर्थ है नहीं है कोई एक अल्लाह के सिवा, हज़रत आदम अल्लाह के नबी है |

 

कभी कहा लाइलाहा इल्लाललाह इब्राहीम खालिलुल्लाह | {नहीं है कोई एक अल्लाह को छोड़ कर, हजरत इब्राहीम अल्लाह का दोस्त है} आगे कहा > ला इलाहा इल्लाललाह, इस्माईल जवीहउल्लाह < इसका अर्थ नहीं है कोई माबूद नहीं, एक अल्लाह को छोड़ कर, हजरत इस्माईल,अल्लाह के रास्ते में जबह होने वाले <

 

ठीक इसी प्रकार कहा गया > ला इलाहा इल्लल्लाह, मूसा कलिमुल्ला <नहींहै कोई माबूद एक अल्लाह के सिवा हजरतमूसा अल्लाह से कलाम करनेवाले हैं

 

< आगे कहा गया ला इलाहा इल्लल्लाह, ईसारूहउल्लाह < नहीं है कोई माबूद एक अल्लाह के सिवा हजरत ईसा मुर्दों में जान {प्राण} डालने वाले हैं

 

< इस प्रकार अल्लाह अपना ज्ञान बदला है, जब सृष्टि में कोई भी पेड़ पौधे अपना नियम नहीं बदलता तो अल्लाह का नियम बदल जाना यह ज्ञान की बातें नहीं है | इससे यह भी पतालगा की अल्लाह दुनिया बनाने वाले नहीं है, कारण अल्लाह अगर दुनिया बनाने वाले होते तो उन्हें यह भी पता होना चाहिए था  की में मरे द्वारा बनाया गया पेड़ पौधे जब अपना नियम बदलते, तो मैं अपना ज्ञान क्यों बदलूं ?

महेन्द्रपाल आर्य = 10 /1 /21