अल्लाह का ज्ञान अधूरी, आपस में ही विरोधी ||

|| अल्लाह का ज्ञान अधूरी,आपस में ही विरोधी ||
परमात्मा अपनी सृष्टि में हमें हमारे कर्मानुसार अपनी अनुकम्पा,से मानव योनी में भेजा अथवा हमलोग अपने कर्मानुसार मानव चोला को प्राप्त किया, जिसमें अपनी बुद्धि की प्रधानता है | इसी कराण हमारा नाम मानव पड़ा, लेकिन दुर्भाग्य से हम ने,मानव कहला कर भी मानवता का परिचय नहीं दे पा रहे हैं |
इसमें कोई हिन्दू है कोई ईसाई है कोई मुसलमान, कोई बुद्धिष्ट, कोई जैनी कहलाने को आतुर है | परन्तु परमात्मा का उपदेश वेद में है मनुर्भव {मानव बनो} अर्थात हमें मानव बनना है | तो यह प्रश्न स्वभाविक होगा क्या हम मानव बनकर नही आये ?
उत्तर है जी नहीं, दुनिया में आकर ही हमें मानव बनना पड़ता है आकृति से नहीं व्यवहार से बर्ताव से रहन सहन से चाल चलन से हमें मानव बनना पड़ेगा तभी हम मानव कहला सकते हैं उससे पहले मानवों में और दानोवों में कोई अन्तर नहीं होगा |
किन्तु कुरान इससे सहमत नहीं कुरान में अल्लाह ने मुसलमान बनने को कहा, और अल्लाह को अपनी बात पर ही भरोसा नहीं की कौन सी बात अल्लाह की सही है देखें कुरान में अल्लाह ने इब्राहीम नाम के एक पैगम्बर जिनको मुसलमान बताया है की वह मुस्लमान थे | जो सूरा 3 अल इमरान आयात 67 में कहा |
फिर सूरा 6 अल अन्याम के आयात 14 में बोला सबसे पहल मुस्लमान हजरत मुहम्मद है | अब दुनिया वालों को यह विचार करना है की यह कुरान ईश्वरीय ज्ञान है ?
कारण ईश्वरीय ज्ञान में आपस में एक दुसरे के विरोधी बातें नहीं होना चाहिए |
قُلْ يَا أَهْلَ الْكِتَابِ تَعَالَوْا إِلَىٰ كَلِمَةٍ سَوَاءٍ بَيْنَنَا وَبَيْنَكُمْ أَلَّا نَعْبُدَ إِلَّا اللَّهَ وَلَا نُشْرِكَ بِهِ شَيْئًا وَلَا يَتَّخِذَ بَعْضُنَا بَعْضًا أَرْبَابًا مِّن دُونِ اللَّهِ ۚ فَإِن تَوَلَّوْا فَقُولُوا اشْهَدُوا بِأَنَّا مُسْلِمُونَ [٣:٦٤]
फिर अगर इससे भी मुंह फेरें तो (कुछ) परवाह (नहीं) ख़ुदा फ़सादी लोगों को खूब जानता है (ऐ रसूल) तुम (उनसे) कहो कि ऐ अहले किताब तुम ऐसी (ठिकाने की) बात पर तो आओ जो हमारे और तुम्हारे दरमियान यकसॉ है कि खुदा के सिवा किसी की इबादत न करें और किसी चीज़ को उसका शरीक न बनाएं और ख़ुदा के सिवा हममें से कोई किसी को अपना परवरदिगार न बनाए अगर इससे भी मुंह मोडें तो तुम गवाह रहना हम (ख़ुदा के) फ़रमाबरदार हैं | इमरान 67
قُلْ أَغَيْرَ اللَّهِ أَتَّخِذُ وَلِيًّا فَاطِرِ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ وَهُوَ يُطْعِمُ وَلَا يُطْعَمُ ۗ قُلْ إِنِّي أُمِرْتُ أَنْ أَكُونَ أَوَّلَ مَنْ أَسْلَمَ ۖ وَلَا تَكُونَنَّ مِنَ الْمُشْرِكِينَ [٦:١٤]
ऐ रसूल) तुम कह दो कि क्या ख़ुदा को जो सारे आसमान व ज़मीन का पैदा करने वाला है छोड़ कर दूसरे को (अपना) सरपरस्त बनाओ और वही (सब को) रोज़ी देता है और उसको कोई रोज़ी नहीं देता (ऐ रसूल) तुम कह दो कि मुझे हुक्म दिया गया है कि सब से पहले इस्लाम लाने वाला मैं हूँ और (ये भी कि ख़बरदार) मुशरेकीन से न होना | अन्यांम 14

आप लोगों के सामने मैंने दोनों ही आयत प्रस्तुत कर दिया आप लोग देखें पढ़ें और निर्णय लें श क्या है और गलत क्या है ?
धन्यवाद के साथ महेंद्र पाल आर्य =19 /2 /19