अल्लाह के नज़र में काफ़िर कौन, किसे काफिर कहा अल्लाह ने ?

 

अल्लाह के नज़र में काफ़िर कौन ?

परमात्मा ने सृष्टि की रचना की जिसमे उत्कृष्ट प्राणी मानव को बताया,मात्र अक्ल के आधार पर यह मानव बना | धरती पर जितने भी प्राणी हैं उन सब में उत्कृष्ट मानव ही है |

इस लिए मानव को अफ्ज़लुल मख्लुकात {उत्कृष्ट} प्राणी कहा गया है, अब प्रशन है की जब सृष्टि बनाने वाले ने मानव को उत्कृष्ट प्राणी नाम दिया, तो उसके कार्य भी उत्कृष्ट होनी चाहिए न की निकृष्ट ? जब सृष्टि बनाने वाले ने मानव को श्रेष्ट बताया, तो क्या परमात्मा ने मानव का विभाजन किया है ?

जवाब है :- हाँ परमात्मा ने मानव का विभाजन किया है, किस नाम से किया, फिर जवाब है श्रेष्ट,और निकृष्ट= योग्य,अयोग्य= लायक, नालायक= सभ्य,असभ्य=सामाजिक,असामाजिक |

परन्तु परमात्मा ने मानव को ईमानदार, और बेईमान, नहीं कहा, कारण भारतीय भाषा में बेईमान एक गाली है | जब परमात्मा ने मानव को सबसे उत्कृष्ट बनाया फिर उसी मानव को गाली दे यह अच्छी बात नहीं है |

पर कुरान को आप ध्यान पूर्वक पढेंगे तो आप को ईमानदार शब्द बहुत बार मिलेंगे, अब इस ईनामदार, शब्द का जब विलोम शब्द देखेंगे तो यही मिलेगा बेईमान | तो अल्लाह ने इसी  में बात ख़त्म नहीं की,अपितु काफ़िर कहके पुकारा | कुरआन में ईमानदार मात्र मुसलमानों को ही कहा है, मुसलमान से अतिरिक्त जितने भी है वह सब अल्लाह के नज़र में और अल्लाह के कहने पर इस्लाम वालों के नज़र में, जितने भी गैर इस्लामी है वह सब काफ़िर है बेदीन है, बेईमान हैं |

अब अल्लाह ने काफ़िर उन्हें कहा, जो लोग यानि मानव कहलाने वाले जो अल्लाह को नहीं मानता, यद्यपि धरती पर मानव कहलाने वाले बहुत मिलेंगे, जो ईश्वर को नहीं मानते, अथवा अल्लाह को नहीं मानते | कुछ लोग उन्हें नास्तिक कहते हैं, परन्तु सिर्फ आल्लाह को मानने से अल्लाह संतुष्ट नहीं है | फिर अल्लाह कहते हैं मुझे तो मानों साथ साथ मेरे रसूल को मानो पैगम्बरों को मानों फ़रिश्ते को मानो | कयामत को मानों जन्नत {स्वर्ग} जहन्नुम {नरक} को मानों, कयामत {प्रलय} के बात स्वर्ग नरक में जाना है निश्चित मानों, अच्छे बुरे का किस्मत को मैंने बनाया {अल्लाह ने} उसे भी साथ मानों, आदि तो मुसलमान खलाव गे|

 

قُلْ مَن كَانَ عَدُوًّا لِّجِبْرِيلَ فَإِنَّهُ نَزَّلَهُ عَلَىٰ قَلْبِكَ بِإِذْنِ اللَّهِ مُصَدِّقًا لِّمَا بَيْنَ يَدَيْهِ وَهُدًى وَبُشْرَىٰ لِلْمُؤْمِنِينَ [٢:٩٧]

(ऐ रसूल उन लोगों से) कह दो कि जो जिबरील का दुशमन है (उसका खुदा दुशमन है) क्योंकि उस फ़रिश्ते ने खुदा के हुक्म से (इस कुरान को) तुम्हारे दिल पर डाला है और वह उन किताबों की भी तसदीक करता है जो (पहले नाज़िल हो चुकी हैं और सब) उसके सामने मौजूद हैं और ईमानदारों के वास्ते खुशख़बरी है | 2/97

مَن كَانَ عَدُوًّا لِّلَّهِ وَمَلَائِكَتِهِ وَرُسُلِهِ وَجِبْرِيلَ وَمِيكَالَ فَإِنَّ اللَّهَ عَدُوٌّ لِّلْكَافِرِينَ [٢:٩٨]

जो शख्स ख़ुदा और उसके फरिश्तों और उसके रसूलों और (ख़ासकर) जिबराईल व मीकाइल का दुशमन हो तो बेशक खुदा भी (ऐसे) काफ़िरों का दुश्मन है | 2/98

 

प्रशन यह है की मानव मात्र को ईश्वर को मानना तो ज़रूरी है कारण यह काम ही मानव का है, अन्य किसी दुरे प्राणियों का नहीं | पर ईश्वर को मानने के साथ औरों को किस लिए मानना होगा यही एक सवाल इस्लाम के सामने है | जिसका जवाब आज तक नहीं आया मैंने ने इन्हें समय दिया है प्रलय के दिनों तक | आ जाय सामने दुनिया वालों को भी सत्य से रूबरू करें | धन्यवाद के साथ महेन्द्रपाल आर्य =30 /9 /18