अल्लाह सब कुछ जानने वाला नहीं है |

कुरानी अल्लाह सब कुछ जानने वाला नहीं है ||
ईद उल अजहा पर कुर्बानी दी जाती है। यह एक जरिया है जिससे बंदा अल्लाह की रजा हासिल करता है। बेशक अल्लाह को कुर्बानी का गोश्त नहीं पहुँचता है, बल्कि वह तो केवल कुर्बानी के पीछे बंदों की नीयत को देखता है। अल्लाह को पसंद है कि बंदा उसकी राह में अपना हलाल तरीके से कमाया हुआ धन खर्च करे। कुर्बानी का सिलसिला ईद के दिन को मिलाकर तीन दिनों तक चलता है |
नोट :- कुर्बानी का मकसद क्या है देखें की अल्लाह के पास क़ुरबानी का गोश्त नहीं पहुंचता है –बल्कि अल्लाह ताला अपने बन्दे की नियत उद्देश्य को देखता है | मतलब यह हुवा की अल्लाह को पहले से अपने बन्दे का नियत को नहीं जानता है –अर्थात कुरबानी देने के बाद जान पाता है |
क्या है कुर्बानी का इतिहास- इब्राहीम अलैय सलाम एक पैगंबर गुजरे हैं, जिन्हें ख्वाब में अल्लाह का हुक्म हुआ कि वे अपने प्यारे बेटे इस्माईल (जो बाद में पैगंबर हुए) को अल्लाह की राह में कुर्बान कर दें। यह इब्राहीम अलैय सलाम के लिए एक इम्तिहान था, जिसमें एक तरफ थी अपने बेटे से मुहब्बत और एक तरफ था अल्लाह का हुक्म। इब्राहीम अलैय सलाम ने सिर्फ और सिर्फ अल्लाह के हुक्म को पूरा किया और अल्लाह को राजी करने की नीयत से अपने लख्ते जिगर इस्माईल अलैय सलाम की कुर्बानी देने को तैयार हो गए।
नोट :-जो अल्लाह दुनिया बनाने वाला है वह अल्लाह किसी को यह हुक्म कैसे दे सकते हैं की तुम्हारा बेटे को मेरे रस्ते में कुर्बान करो ? इससे अल्लाह की दयालुता नहीं बल्कि अल्लाह की कठोरता व निष्ठुरता का प्रमाण मिलता है | किसी बाप के लिए बेटे की क़ुरबानी शब्द ही गलत है और वह भी अल्लाह इस काम को करें, इससे बड़ा जुल्म मानवों के लिए और क्या हो सकता है ?
अल्लाह रहीमो करीम है और वह तो दिल के हाल जानता है। जैसे ही इब्राहीम अलैय सलाम छुरी लेकर अपने बेटे को कुर्बान करने लगे, वैसे ही फरिश्तों के सरदार जिब्रील अमीन ने बिजली की तेजी से इस्माईल अलैय सलाम को छुरी के नीचे से हटाकर उनकी जगह एक मेमने को रख दिया। इस तरह इब्राहीम अलैय सलाम के हाथों मेमने के जिब्हा होने के साथ पहली कुर्बानी हुई। इसके बाद जिब्रील अमीन ने इब्राहीम अलैय सलाम को खुशखबरी सुनाई कि अल्लाह ने आपकी कुर्बानी कुबूल कर ली है और अल्लाह आपकी कुर्बानी से राजी है।
नोट :-इस किस्से में सच्चाई नाम का एक भी शब्द नहीं है –अल्लाह को रहमान और रहीम भी बताया गया है – क्या अल्लाह की यही दयालुता है ? अल्लाह की अपने दोस्त का इम्तेहान लेना हो तो वह अल्लाह सब कुछ जानने वाला क्यों और कैसे हो सकते हैं ? मतलब यह हुवा की अल्लाह पहले से नहीं जांनता है की इस काम को यह कर सकता हैं या नहीं ?
कुर्बानी के पीछे मकसद- बेशक अल्लाह दिलों के हाल जानता है और वह खूब समझता है कि बंदा जो कुर्बानी दे रहा है, उसके पीछे उसकी क्या नीयत है। जब बंदा अल्लाह का हुक्म मानकर महज अल्लाह की रजा के लिए कुर्बानी करेगा तो यकीनन वह अल्लाह की रजा हासिल करेगा, लेकिन अगर कुर्बानी करने में दिखावा या तकब्बुर आ गया तो उसका सवाब जाता रहेगा। कुर्बानी इज्जत के लिए नहीं की जाए, बल्कि इसे अल्लाह की इबादत समझकर किया जाए। अल्लाह हमें और आपको कहने से ज्यादा अमल की तौफीक दे।
नोट :-अगर कोई इंसान अल्लाह की रजामंदी के लिए बेटे की क़ुरबानी करें तो वह मानव कहलाने का भी हकदार नहीं हो सकता ? कारण मानवता क्या है विचार पूर्वक किसी काम को अंजाम देना या करना | फिर वह इबराहीम जब उसी मानवता को अल्लाह के कहने पर छोड़ दे तो यह दोनों पर दोष लगा अल्लाह और अल्लाह के नबी पर |
कौन करें कुर्बानी- शरीयत के मुताबिक कुर्बानी हर उस औरत और मर्द के लिए वाजिब है, जिसके पास 13 हजार रुपए या उसके बराबर सोना और चाँदी या तीनों (रुपया, सोना और चाँदी) मिलाकर भी 13 हजार रुपए के बराबर है।
वाजिब है कुर्बानी देना- ईद उल अजहा पर कुर्बानी देना वाजिब है। वाजिब का मुकाम फर्ज से ठीक नीचे है। अगर साहिबे हैसियत होते हुए भी किसी शख्स ने कुर्बानी नहीं दी तो वह गुनाहगार होगा। जरूरी नहीं कि कुर्बानी किसी महँगे जानदार की की जाए। हर जगह जामतखानों में कुर्बानी के हिस्से होते हैं, आप उसमें भी हिस्सेदार बन सकते हैं।
अगर किसी शख्स ने साहिबे हैसियत होते हुए कई सालों से कुर्बानी नहीं दी है तो वह साल के बीच में सदका करके इसे अदा कर सकता है। सदका एक बार में न करके थोड़ा-थोड़ा भी दिया जा सकता है। सदके के जरिये से ही मरहूमों की रूह को सवाब पहुँचाया जा सकता है।
नोट :-यहाँ कुर्बानी के लिए 13 हज़ार जामा पूंजी होना जरूरी है बताया गया है, इतने का सोना चांदी नगद रुपया हो तो उसके लिए क़ुरबानी जरूरी वाजिब हो जाता है | इससे अल्लाह को क्या लाभ हो रहा है ? अगर अल्लाह को लाभ नहीं तो अल्लाह हुकुम किस लिए देते हैं ?
अल्लाह को यह लाभ जरुर है की मुसलमान अपनी दिमाग का प्रयोग न करें अपनी दिमाग में ताला दाल दे और उसे जितना अल्लाह के द्वारा बताया जाय उसे अंजाम दे | यह हैं मज़हबी हुकुम और मजहब में मानव अपनी मानवता पर दखल नहीं दे सकता उसे सिर्फ और सिर्फ अल्लाह का ही हुकुम ही मानना है और वह मानवता विरोधी ही क्यों न हो ? यह मज़हबी आदेश वह भी अल्लाह का अब मानव कहलाने वालों को यह सोचना
होगा की उसे जी दिमाग मिला है उससे काम ले या फिर दिमाग में ताला दाल कर अल्लाह का हुक्म मानें ? महेन्द्र पाल आर्य =21 जुलाई 21 ईद उल अजहा का विशेष लेख |
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