आज धर्म के साधना पक्ष पर विचार करते हैं |

|| आज धर्म के साधना पक्ष पर विचार करते हैं ||

अब तक आप लोगों ने निरन्तर पिछले 25 जून से मेरे द्वारा धर्म के विभन्न पहलुओं पर विचार को पढ़ा है और चिंतन भी किया होगा | आज धर्म के साधना पक्ष को भी देखेते हैं की आखिर धर्म के साथ साधना का क्या सम्पर्क और सम्वन्ध है ?

 

धर्म का साधना पक्ष वह है की जीवात्मा की जो उन्नति है आगे के लिए वह सिर्फ उसके साधना पर ही निर्भर करता है | या फिर यह कहेंगे की जीवात्मा की इस विकास प्रक्रिया को तीब्र करना ही उसका साधना पक्ष है | जीवात्मा अपनी उन्नति को मात्र साधना पक्ष के द्वारा ही सफल कर सकता है | मानव जीवन मिलने का जो नियम या तरीका है, वह यह है की जब पाप और पूण्य बराबर होता है तो मानव जीवन मिलता है ऋषि दयानन्द सरस्वती जी ने अपनी सत्यार्थ प्रकाश के नवम समुल्लास में भी लिखा है |

 

पाप और पूण्य जब बरा बर हो तो मानव जीवन मिलता है, जिसमें तीन विभाग हैं मानवों के स्त्री लिंग, पुलिंग, और नपुन्सक लिंग | यह तीनों अपने कर्मानुसार ही प्राप्त होता है, और कर्म बनता है साधना पक्ष से ही | जीवात्मा की उन्नति भी इसी में निहित है अपने साधना के वल पर कोई ऋषि बनते हैं, और कोई देवता बनते है और कोई राक्षस बनते है |

 

यह सारा खेल जीवात्मा के साधना पक्ष से ही प्राप्त होता है, कारण मानव जीवन का जो उद्देश्य है वह मात्र खाना पीना रहन सहन ही नहीं है, मानव जीवनका लक्ष्य है ईश्वर प्राप्ति, और ईश्वर को प्राप्त करने के लिए ही साधना ही एक मात्र तरीका है | साधना से ही मानव मानव बना, कारण मानव ही एक मात्र ऐसा योनी है जहाँ कर्म और भोग दोनों ही है, मानव से अतिरिक्त जितने भी योनियाँ है वह मात्र भोग ही है कर्म नहीं कर सकता मानवों को छोड अन्य कोई भी प्राणी |

 

यही कारण बना की मानव जीवन में ही एक मात्र उन्नति का रास्ता है साधना, अगर मानव जीवन का साधना पक्ष नहीं हुवा, फिर मानव की उन्नति रुक जाएगी, इसीलिए साधना पक्ष में दो कार्य महत्वपूर्ण होते हैं, एक अवरोधों को हटाना, जिसे पतंजली ऋषि योगश्चित्तिवृत्ति निरोध: बताया | अर्थात चित्त के वृत्ति को रोकना, यह मन की इच्छाओं को रोकना उसका विरोध करना आदि | और दूसरा है साधना की गति को बढ़ाना, सामान्य तया ऐसे अवरोध तो आचरण से हट जाते हैं | किन्तु कुछ संस्कारगत अवरोध होते हैं जो साधना में निरंतर विघ्न डालते हैं | जिससे साधना में वाधा पड़ती है, मात्र साधना में बाधा ही नहीं होती अपितू साधना भंग भी हो जाती है |

साधना काल में इनकी अनुभूति होने पर, कुछ विशेष विधियों द्वारा उन्हें दूर किया जा सकता है | वरना यह साधक का मार्ग ही बदल देती है, और यह साधक उस समय पथ भ्रष्ट भी हो जाता है | यहाँ तक की साधना के गलत नियमों से, साधक पागल भी बनजाता है | इसलिए, साधना काल में अनेक ध्यान रखने की बात ऋषियों ने बताई है | मूल रूप से योग के आठ {8} अंग बताये गये है, यम नियमों से लेकर समाधि तक | इन आठ अंगों को प्राप्त करने में मूल रूप से नो {9} वाधाएँ हैं, और यह सब कड़ी एक के साथ दूसरी कड़ी जुड़ी होई है अगर बीच से गलत साधना में कड़ी टूट जाये, तो पुन: शुरू से ही आना पड़ेगा जैसा प्रारम्भ में लगे थे |

 

यह सारा मानव जीवन के साधना पक्ष है, इसे जीवन में उतारने के लिए साधना काल में शारीरिक उर्जा का प्रवाह तीब्र हो जाता है | इसी उर्जा को हर बुराइयों से रोकना तथा अपनी आत्मिक उन्नति के विकास की ओर प्रवृत्त होने को ही साधना पक्ष कहा जाता है |

 

इसमें शुचिता की बहुत जरूरत होती है, जैसा तन की शुद्धि, मनकी शुद्धि, स्थान की शुद्धि, वस्त्र की सुद्धि, भोजन की शुद्धि आदि की अनिवार्यता है वरना साधना ठीक नहीं हो सकता और न साधक अपने कार्य में सफलता को प्राप्त कर सकता हैं |

 

एक बात आप लोगों ने जरुर ध्यान दिया होगा की, साधना पक्ष को जीवन में अगर सही सही नहीं उतार पाया तो साधक के पथ भ्रष्ट होने की संभावना है बताया | यहाँ मानव पथ भ्रष्ट कैसे हो रहा है अपने गलत जानकारी, और गलत अभ्यास के कारण |

 

किन्तु इस्लामी मान्यता अनुसार तो कुरान में अल्लाह मानव को गुमराह करते हैं जिसे चाहा उसे गुमराह किया, और जिसे चाहा सही मार्ग दिखाया | यह अल्लाह की मनमानी है देखें जब की एक नेक इन्सान भी किसी को गुमराह नहीं करता, फिर उस के गिनती अच्छे इंसानों में भी नहीं होती | दखें कुरान में क्या कहा अल्लाह ने >

وَلِلَّهِ مُلْكُ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ ۚ يَغْفِرُ لِمَن يَشَاءُ وَيُعَذِّبُ مَن يَشَاءُ ۚ وَكَانَ اللَّهُ غَفُورًا رَّحِيمًا [٤٨:١٤]

और सारे आसमान व ज़मीन की बादशाहत ख़ुदा ही की है जिसे चाहे बख्श दे और जिसे चाहे सज़ा दे और ख़ुदा तो बड़ा बख्शने वाला मेहरबान है | अनेक प्रमाण है कुरान में

आज यही तक फिर कल =महेन्द्रपाल आर्य = 7 =7 =18 =