आज हिन्दुओं को अपना सुधार जरूरी है |

|| आज हिन्दुओं को अपना सुधार जरुरी है ||
एक परमात्मा की भक्ति को छोड़ जो अनगिनत देवताओ, अवतारों, मूर्तियों,पशु पक्षियों से लेकर,तत्वों और द्रव्यों की पूजा प्रचलित हो चुकी थी उसने राष्ट्रिय सम्मान, और राष्ट्रिय विचारधारा को नष्ट करदिया है |
हिन्दू झाड़ू के तिनके के भांति बिखर चुके हैं शारीरिक और आत्मिक पराधीनता का शिकार होकर अपना अस्तित्व स्वयं ही मिटाने को अग्रसर बहुत पहले से ही हो चुके हैं | हिन्दू जब अपने अस्तित्व को भूलने लगे है, इसमें सबसे बड़ा योगदान, मुसलमानो और ईसाईयों का रहा है | कारण सृष्टि के आदि से यह देश और देशवासी, ऋषियों के सन्तान कहे या कहलाये जाते रहे हैं आज भी यहाँ के मूल निवासियों के गोत्र भी उन ऋषियों के नाम से है |
प्रश्न यह है की किस प्रकार इन ऋषि सन्तानों में यह बिकृति आई है ? यह प्रशन बड़ा महत्वपूर्ण है, की जब सृष्टि के प्रथम से अग्नि वायु आदित्य अंगीरा से लेकर कपिल कणाद पतंजली गौतम जैमिनी और व्यास आदि ऋषिओं का यह देश है तो क्या हुवा इस देश का जो इस देश के लोग ऋषि परम्परा को छोड़, और अपनी संस्कृति को भूल कर अन्यों की संस्कृति को यहाँ पनपने क्यों दिया ?
जिसदेश में मर्यादा पुरुषोत्तम राम, और योगेश्वर श्री कृष्ण जैसे महा पुरुषों का आगमन हुवा | जिन्होंने ऋषि और मुनियों के शरणों में बैठ कर विद्या अध्ययन किया गुरुकुलों में बैठ कर शास्त्र, और शस्त्र विद्या में निपुण हुए आज तक जिनलोगों की महिमा गान इसी देश के लोग गा रहे हैं या गाते आये हैं | जिनकी शुरवीरता व पराक्रम को आज भी धरती पर लोग याद कर रहे हों, उनके संतानों में यह परिवर्तन | अथवा उन्ही राम और कृष्ण के देश में यह परिवर्तन जिसे सोचने में भी हैरानी होती है,जिसदेश के चरवाहे भी खेतखलिहानों में पशु चराते समय सामवेद का गायन किया करते थे या सामवेद सुनाया करते थे, जो हमारा संगीत शास्त्र है स्वरों के खेल है जिस स्वरों से जंगल के हाथी भी मदमस्त होते थे, जिन स्वरों से जंगल के मयूरी भी अपने पंखों से लोगों के मन मोह लेती थी | यहाँ तक के जिन स्वरों से सांप जैसे डसने वाली जिव भी अपना फन उठाकर स्वरों से मदमस्त होता है |
जो दुनिया के अन्य किसी भी मुल्क वालों के पास नहीं है यह स्वर, और ना किसी भी स्म्प्रोदय के मानने वालों के पास यह कला है | इससे यह भी स्पष्ट होता है की यह स्वरों की जो जादू है अथवा स्वरों की जो कला है वह सृष्टि के आदि में सृजन कर्ता परमात्मा ने सिर्फ और सिर्फ भारत के ऋषिओं को दिया है, गायन वादन की जो कला है वह सब वेद से ही मिला है जिसे सामवेद कहा जाता है,आदि |
कुछ भी हो जो भूल हुई है उसे देखते हैं कहाँ कहाँ हमारे लोगों से भूल हुई है | प्रथम भूल तो यह हुई की हमारे लोगों ने, परमात्मा को भूल कर, बहुप्रकार की पूजा अपने हाथों से मूर्ति बनाकर उसे परमात्मा मानने लगे जो सबसे बड़ी भूल है और परमात्मा के साथ विश्वास घात भी है | भूल इसलिए भी है जो परमात्मा नहीं है उसे परमात्मा जानना और मानना यह मानवता पर भी कुठाराघात है |
गलती यह हुई, ऋषि और मुनियों ने वेदों की ओर लौटने को कहा और हमारे लोग वेद से दूर होते गये जब मनुष्य कहलाने वालों से भूल हो जाती है तो उसी एक भूल को सुधारने में काफी समय लग जाता है या तो जीवन समाप्त हो जाता है उसकी सुधार नहीं हो पाती | और यही हुवा भी इसके बाद इसी गलती के कारण हमारा देश भी गुलाम बन गया मुसलमानों का |
इसी मूर्ति पूजा के साथ साथ जिन्हें ऋषि संतान के नाम से पुकारा गया, वही लोग विदेशी आक्रमण कारियों को अपना रक्षक माना उन्हें अपनी संस्कृति में मिलाने के बजाये उन्ही की संस्कृति को अपना लिया, जिसका नतीजा आज सामने आया जबरदस्त तरीके से | जो मदरसा हो या विश्वविद्यालय से पढ़े इस्लाम के मानने वाले किस प्रकार उन इस्लामी आतंकवाद में सम्मिलित हो रहे हैं जो आज आये दिन हम देखते और सुनते हैं |
जब यहाँ के लोगों ने वेदों से अपना नाता तोडा ऋषियों के प्रचार प्रसार को अनदेखी किया अनसुना किया, और मूर्तियों को अपना रक्षक मान कर उसकी पूजा करने लगे, इसी को इस्लाम वालों ने पकड़ लिया, और ऋषि संतानों को एकेश्वरवाद बताने लगे | जबकि एकेश्वरवाद सिर्फ वेद में ही है, और कहीं नहीं, और वेद को छोड़ कर किसी के पास भी नहीं | इस प्रकार जब ऋषि संतान वेद से अलग हो गये, अनेक देवता वाद को अपना कर मिटटी या पत्थर की मूर्ति को ईश्वर मान कर उसी से माँगने लगे उसके सामने नतमस्तक होने लगे उसे ही अपना रक्षक मानने लगे, तो इस्लाम वालों ने मंदिर और मूर्तियों को धस्त कर दिखाया की देखो तुम लोगों की यह कल्पना कोरा झूठ है | यहाँ तक की इसी भारत या आर्य वर्त के अनेकों मंदिरों को तोड़कर मस्जिद बनाली, जिसमें अनेक उल्लेख नीय मंदिर, सोमनाथ मंदिर, काशीविश्व नाथ मंदिर,राम जन्मस्थली, श्रीकृष्ण जन्मस्थली भी शामिल है |
यह सभी जीता जागता प्रमाण है हमारे सामने, इतना सब कुछ देख कर भी हिन्दू समझने को तैयार नहीं है | मुसलमान सिर्फ मंदिरों को और मूर्तियों को ही नहीं अपनी वर्चस्व कायेम कर इस देश को भी हिन्दू मुस्लिम के नाम से कई टुकड़े कर दिया उनकी संख्या वृद्धी होते ही अलग देश बनालिया इस भारत को तोड़ कर | इसका जीता जागता प्रमाण कई है, इसके बाद भी यह ऋषि संतान जागने को तैयार नहीं | यहाँ तक की यही ऋषि संतान कुछ भी सोचने समझने को तैयार ही नहीं हो रहे, किसी के पास कोई ईलाज या चिकित्सा नहीं है जब की आयुर्वेद चिकित्सा इसी देश का ही है | ऋग्वेद का उपवेद है आयुर्वेद है किन्तु ऋषि संतान ला इलाज ही हो गये सारे वैद्य फेल हो गये इन मरीजों के सामने | यह मरेंगे और देश के लोगों को भी लिए मरेंगे, आज यत्र तत्र आतंकवादी पकडे जा रहे हैं उन्ही के पक्ष में यही ऋषि संतान खड़े हैं जिनको अपने दोस्त और दुश्मन का भी ख्याल नहीं और ज्ञान भी नहीं है की कौन हमारा दोस्त है और कौन हमारा दुश्मन यह दशा है आज भारत के इन ऋषि संतानों की |
आज के दिन यह आँखों देखा हाल जो उ० प्र० में सामने उपस्थित हुवा है, इसे देख कर भी इन्ही हिन्दू समाज के गुरु कहलाने वाले जिनको लोग आचार्य प्रोमोद कृष्णन के नाम से जानते हैं वह भी न्यूज़ चेनल में बैठ कर उन्ही आतंकवादियों के पक्ष में बोल रहे हैं |
कोई एक व्यक्ति क्या करे जो लोग इस देश में रहते हैं इसदेश को अपना नहीं मानते देश को बर्बाद करने में तुले हैं उनके सुर में सुर मिला कर इसी देश के मूल जिसे ऋषि संतान कहा गया जिनका गोत्र भी ऋषियों का है वही उन आतंकवादियों के पक्ष में बोलने लगे हैं फिर इसदेश को बचने वाला कौन हैं ?
अपने स्वार्थ में डूबे लोगों द्वारा यही देश दो बार गुलाम बना, एक बार मुसलमानों का, और दुसरे बार अंग्रेजों का आज उसी स्वार्थ के वशीभूत होकर इसदेश के साथ विश्वासघात कर रहे हैं | कौन है इस देश का बचाने वाला जो सुरक्षा संगठन के सेना हैं, उन्हें भी फर्जी बता रहे हैं फिर इस देश का क्या होगा बड़े दुःख के साथ इस लेख को मुझे लिखना पड़ा दूरदर्शन में बैठ कर NIA जैसे हमारे रक्षकों को पर सवाल खड़ा करते भी लजाते नहीं है यह लोग |
महेन्द्रपाल आर्य =27 /12 /18 =