आर्य समाज की स्थापना राष्ट्रवाद के लिए |

|| आर्य समाज की स्थापना राष्टवाद के लिए ||

हमें पताचला ऋषि दयानन्द जी के जीवनी से, किन, किन बातों को ऋषि ने देखा जाना, समझा, और परख ने के बाद ही आर्य समाज की स्थापना की |

उनदिनों भारत में अंग्रेजों का शासन था, भारतीय लोग परेशान हो उठे थे अंग्रेजों के खिलाफ भारत के लोग एक मुहीम चला रहे थे विदेशी राजा के खिलाफ, ऋषि दयानन्द जी अपने गुरु विरजानन्द जी को गुरु दक्षिणा में यही चार वचन दिए थे | {1} स्वधर्म {2} स्वराष्ट्र {3} स्वसंस्कृति {4 } स्वभाषा | यही चार बातों के प्रचार प्रसार करने का वचन अपने गुरु विरजानंद को दे कर प्रचार कार्य में उतरे थे |

 

ऋषि दयानन्द जी ने अपने गुरु को यही वचन दिया था की, हम मरते दम तक इस दिए वचनों को निभाएंगे | धर्म के नाम से चलाये जा रहे सभी कुप्रथायों का विरोध ऋषि ने हरिद्वार में पाखण्ड खंडनी पताका फहराकर किया था |

स्वराष्ट्र का प्रचार अंग्रेज वैसराय के मुह पर कहा विदेशी रजा को हम पसंद नहीं करते, परमात्मा से प्रार्थना करते हैं, अपने ही देश के लोग इस देश का रजा बनें |

 

वैदिक परम्परा का उजागर करना ही ऋषि का स्व संस्कृति का प्रचार था | स्व भाषा के प्रचार में ऋषि ने कहा हिंदी ही एक मात्र भाषा है जो सम्पूर्ण भारत को इसी एक धागा में पिरोया जा सकता है |

 

भारत में अनेकों मत पन्थ के लोग अपनी दुकान धर्म का नाम दे कर चला रहे थे | ऋषि दयानन्द ने सब को निरुत्तर करते हुए कहा धर्म मानव मात्र का एक ही होता है अनेक धर्म होने पर परमात्मा पर दोष लगेगा | आकाश, पाताल, सूर्य, चन्द्रमा, नदी नाला, सागर, पर्वत से लेकर वनस्पति इन सब में भेद नहीं, यह सब के लिए है सब को सामान रूप से दिया है, ठीक इसी प्रकार धर्म मानव मात्र का एक ही है |

 

अपनी अमर ग्रन्थ सत्यार्थ प्रकाश में, जन्म से मृत्यू तक क्या करना क्या नहीं करना,किस प्रकार करना किस प्रकार नहीं करना भली प्रकार दर्शाते हुए, यह भी दर्शाए बौधिष्ट,जैनी, ईसाई, इस्लाम, यह कोई धर्म नहीं है | और यह लोग जिन जिन पुस्तकों को ईश्वरीय बता रहे हैं,यह कदापि ईशग्रन्थ नहीं हो सकता |

 

ऋषि ने स्पष्ट लिखा है सत्यार्थ प्रकाश के अन्तिम चार समुल्लासों में, की यह मत मजहब वाली किताब ईश्वरीय नहीं है और ना इन ग्रंथों का ईश्वरीय होना संभव है |

 

अब प्रश्न उठता है की ऋषि दयानंद जी ने आर्यसमाज की स्थापना की, इन सभी कु प्रथाओं को मिटाने के लिए, और अपने विचार ऋषि ने लिखा है वेद सब सत्य विद्याओं की पुस्तक है, वेद का पढ़ना, पढ़ाना सुनना और सुनाना सब आर्यों का परम धर्म है |

 

अब कोई व्यक्ति दयानन्द जी की बनाई हुई संस्था में बैठ कर आर्यों के धरोहर दयानन्द की कृति मूल सिद्धांत सत्यार्थप्रकाश पर प्रति वंध मुसलमानों को साथ लेकर करें | अब आर्य समाजी बताएं की क्या वह व्यक्ति आर्यसमाजी है ? अथवा आर्य समाज के सभा में बैठने लायक है ? फिर अग्निवेश का साथ देने वाले लोग आर्यसमाजी क्यों और कैसे कहला सकते हैं ?

पहले जिस व्यक्ति ने पंजाब के स्वर्णमन्दिर में जाकर बोला सत्यार्थ प्रकाश में गुरुग्रन्थ पर दयानन्द जी ने जो लिखा है उसे मैं हटवा दूंगा | अब सार्वदेशिक सभा का प्रधान मैं हूँ मैंने मन बनाया है, जो भी टिप्पणी स्वामी दयानन्द जी ने की है नानक देव जी पर उन सभी को मैं हटा दूंगा |

मेरा सवाल अग्निवेश समर्थकों से है, की यह अधिकार किसने दिया अग्निवेश को, की सत्यार्थ प्रकाश ग्रन्थों में वह परिवर्तन लायें ?

 

जब इस वक्तव्य पर सम्पूर्ण आर्य जगत में विरोध हुवा, तो अग्निवेश ने खलील खान, और उस्मान गनी नाम के दो व्यक्ति को लेकर इसी सत्यार्थ प्रकाश पर प्रतिवंध लगाने के लिए दिल्ली के 30 हजारी कोर्ट में केस दायर किया |

 

अग्निवेश के समर्थक बताएं क्या यह काम कोई आर्य समाजी का हो सकता है ? शायद आप लोग कहेंगे की यह काम अग्निवेश का कराया है इसका क्या प्रमाण है ? सबसे बड़ा प्रमाण हमारे पास यह है, की जब यही केस 30 हजारी कोर्ट से हमारे वकील श्री विमल कुमार वधावन जी ने अपने प्रयास से इसी केस को दिल्ली हाईकोर्ट ले गये | तो यही अग्निवेश की निकाली वैदिक सार्वदेशी पत्रिका अंक 31 जुलाई से 6 अगस्त के पेज 1 और पेज 2 से यह सत्यता का पता सबको लग जाना है की केस अग्निवेश द्वारा ही  कराई गयी थी | मैंने इसके साथ देता हूँ आप लोगों को पढ़ कर निर्णय लें | इसके बाद मेरा निरन्तर कई लेख निकला =जैसा =

{1} घरको आग लगी घर के चिराग से |

{2} सन्यास के नाम पर वैदिक मर्यादा पर कुठाराघात

{3} अग्निवेश डाटकाम में आखिर क्या है ?

{4} लाल वस्त्रधारी की साथ लिए फिर रहे लाल बुझक्कड़

{5} आर्य समाज में वह आगलगी जिसमें धुवाँ नहीं

{6} अग्निवेश के बयान में कितना झूठ कितना सच ?

{7} अब टंकारा भीं राज घाट बनने की कगार पर

{8} यह फरियाद मैं किस्से करूँ ?

{9} लाल पगड़ी में सर्वधर्म चेतना का स्वांग

{10} ऐष्णाओं के तृष्णा बुझाने की दौड़ में अग्निवेश

{11} अग्निवेश न मार्क्सवादी न समाजवादी मात्र सुविधावादी है

{12} अरे गाफिलो एक हो जाव अगर मार गैरों की खानी नहीं

और भी बहुत सारे लेख मैंने लिखकर आर्य लोगों को दिया है, जिस का कोई जवाब अग्निवेश की ओर से नहीं मिली | कुछ अखबार के कटिंग मैंने जगवीर एडवोकेट {स्वामी अर्यावेश } को भी भेजा जिसका जवाब मिला आप आयें मिलकर बातें करेंगे | किन्तु फिर मुझे ना बुलाया गया और न कोई समय दिया गया | आर्य कहलाने वालों जरा विचार करें की ऋषि दयानन्द बन्देमातरम के पक्ष में थे अथवा विरोध में ? तो अग्निवेश मुसलमानों को कहते फिर रहे बन्देमातरम ना बोलना किसको क्या बिगड़ना है बिगाड़ें |

 

कश्मीरी अलगाववादी लोगों के पक्ष में अग्निवेश वहां मुसर्रत के पक्ष में गिरिफ्तारी देने के लिए गए, ओम शब्द बोल कर उसे बिसमिल्ला हिररहमा निर्रहीम से पूरा करना क्या यह विचार ऋषि दयानन्द के थे? इतना सब कुछ देख कर सुनकर भी कोई आर्य कहलाने वाला अग्निवेश का पक्षधर बनकर धरना प्रदर्शन करें तो वह लोग आर्य समाजी क्यों और कैसे हो सकते हैं ? जो नक्शालियों के मध्यस्ता करे, बिग्बोस में जा मिले, रामदेव को दिल्ली पुलिस से पिटवा दे, फिर झूठ बोलकर बिग्बोस पहुंचे यही आर्य समाजी है ?

 

महेन्द्रपाल आर्य =22 / 7 /18 =