इसलाम की मान्यता ही जिहालत है |

|| इस्लाम की मान्यता ही जिहालत है ||
इसलाम नाम है अन्ध विश्वास और कुसंस्कार का, कारण कोई भी सवाल नहीं किया जा सकता है जो बोला गया उसे आँख बन्द कर, मानने का नाम, या समर्पण करने का नाम ही इसलाम है | जिसे आप पूर्ण समर्पण कहते हैं, जो कुछ बताया गया उसे दिल से स्वीकार करना और जुबान से इकरार का नाम है इस्लाम | इसका जो कोई दूसरा अर्थ करता है, की इस्लाम का अर्थ शांति है अमन है, जो भारत के प्रधान मंत्री ने भी कहा है | यह अर्थ गलत है | सही अर्थ है अल्लाह के सामने अपने को समर्पण कर देना |
इसमें किसी भी प्रकार का कोई भी सवाल खड़ा नहीं कर सकता या इसलाम में नहीं चल सकता, अतः सही अर्थ :-अपने को अल्लाह के पास सोंप देना | सरेन्डर कर देना आदि |
अब हम देखते हैं इस सोपने में जिहालत, मुर्खता को, इस्लाम की मान्यता है अल्लाह जो चाहता है वह करता है | जिहालत यह है की इन्हों ने दुनिया बनाने वाले को जाना ही नहीं, अल्लाह के नाम से एक भ्रम पाल रखा है | कारण जो दुनिया का बनाने वाला है उसका सारा कामका तरीका है, सिस्ट्म है पद्धति है | जैसा 24 घन्टे का दिन होना, पृथ्वी घूम कर जब सूरज के सामने हो दो दिन कहलाता है | जब पृथ्वी घूम कर सूरज के पीछे हो तो रात कहलाती है | विज्ञान का मानना है, जिधर से सूरज को हम निकलते देखते हैं, उधर को हम पूर्व कहते हैं | अपितु सुरज निकला नहीं और ना निकलता है, ठीक इसी प्रकार जिधर हम सूरज को डूबता हुवा देखते हैं उधर को हम पश्चिम कहते हैं, किन्तु सूरज न निकलता है और ना डूबता है | पर कुरान इन बातों से सहमत नहीं सूरा कहफ़ =आयत 86 कहता है सूरज को कीचड़ वाला तालाब में डूबता हुवा देख गया |
अब इसमें जिहालत और मुर्खता यह है की अल्लाह जो चाहता है करता है, किन्तु कुरान में ही इसका विरोध है | अल्लाह ने चाहा शैतान को आदम के सामने सिजदा करवाना, और हुक्म भी दिया सिजदा करने का, शैतान ने उसे इनकार किया, और उसी अल्लाह को ही चुनौती दे दिया | फिर अल्लाह के चाह पर ही सवाल खड़ा हो गया, पर इसलाम के मानने वालों को सवाल करने की हिम्मत ही नहीं है इसे मानना ही पड़ेगा अल्लाह की निकम्मेपन को | दूसरा प्रमाण है उसी अल्लाह ने अपने अरमान से बनाये गये धरती का पहला मानव आदम को, अल्लाह ने उसे मना किया एक फलको ना खाना, और उस आदम ने पति पत्नी दोनों ही खाए अल्लाह नहीं रोक पाया | इसपर भी कोई मुसलमान सवाल नहीं कर सकता जो है सो मानना ही पड़ेगा सवाल पूछ ना इस्लाम में उच्चित नहीं मना है | तो इंसान के अक्ल कहाँ है उससे काम कब लेना है ? इसी लिए इस्लाम एक अन्धविश्वास का नाम है अगर देखें |
अभी फस्बुक में एक शमशाद अलि -11 jun – रात्रि 9 pm पर एक विचचार लिखा अपना | लिखा =अरे नादानों, यह सभी गैर इस्लामियों के लिए लिखा है |
जबसे हम वजुद में आये, तबसे दुनिया बाकि रहेगी, तबतक एक अटल नियम है, की जबतक हमारी फजर की नमाज का वक्त तमाम नहीं हो जाता – तब तक सूरज निकल ही नहिय सकता – यानि सुबह उठकर जब हम अपनी इबादत से फाखिर हो जाते हैं, तब सूरज निकलकर हमें सलाम करता है | और अप हमें सिखा रहे हो, की हम आप का नमस्कार करें जो निकलने से पहले इंतज़ार करता है हमारी नमाज का वक्त खत्म हिने का |
इस जाहिल को मैंने यह उत्तर लिखा है, और सम्पूर्ण इस्लाम के मानने वालों को यह मेरी चुनौती है आये जिसके अंदर इल्म है वह सामने आयें | इस्लाम सत्य है यह प्रमाणित करने के लिए इस्लाम सत्य से बहुत दूर है इस्लाम झूठ का पुलिंदा है | जिहालत और अन्ध विश्वास का नाम ही इस्लाम है | { कौन आ रहा है सामने आव }
अरे मुर्ख अगर तेरे फजर की नमाज ख़त्म ना होने तक सूरज नहीं निकल सकता अगर तेरी बात अगर सच है गधे यह बता की जब नमाज नाजिल नहीं हुईथी मुहम्मद जब मेराज को नहीं गये थे तो क्या उस समय सूरज नहीं निकलती थी ? तुम जाहिल के जाहिल हो रहोगे नालायक हम लोग सूरज के लिए हैं, की सूरज हमारे लिए है मुर्ख ?
एक मुर्ख और यह निकला राम कुमार तिवारी ||
भाई राम कुमार तिवारी जी वेदानन्द ओझा जी की बात आप को बेसिर पैर की लगी | धन्यवाद आप एक चिन्तन शील व्यक्ति लगते हैं और पढ़ाकू भी लगते हैं | पर आप को बेसिर,पैर का तो पता है = किन्तु धड़ और दिल का पता नहीं है ? कारण इस्लाम में अंग तो क्या सर के बाल तक दुसरे को देना हराम है, चाहे वह मुसलमान को ही क्यों ना दे | क्या आप को इसबात की जानकारी है ? आप जैसों का काम है सत्य पर पर्दा डालना इसके अतिरिक्त आप लोग कुछ भी नहीं जानते | इस्लाम की दाकिया नुसी और अमानवीय बात यह है की, आगर खुद को जरूरत पड़े तो दुसरे का अंग प्रतंग लेना जाएज है, चाहे वह काफिरों से ही क्यों ना लेना पड़े | किन्तु अपना बाल तक किसी को देना हराम हैं, चाहे वह किसी मुसलमान को भी नहीं दे सकता, काफिरों को देने का सवाल ही कहाँ हैं ? जानकारी आप को है नहीं अगर कोई सत्य बोल रहा है उसे झुठलाना ही आप जैसों का काम है |भाई राम कुमार तिवारी जी वेदानन्द ओझा जी की बात आप को बेसिर पैर की लगी | धन्यवाद आप एक चिन्तन शील व्यक्ति लगते हैं और पढ़ाकू भी लगते हैं | पर आप को बेसिर,पैर का तो पता है = किन्तु धड़ और दिल का पता नहीं है ? कारण इस्लाम में अंग तो क्या सर के बाल तक दुसरे को देना हराम है, चाहे वह मुसलमान को ही क्यों ना दे | क्या आप को इसबात की जानकारी है ? आप जैसों का काम है सत्य पर पर्दा डालना इसके अतिरिक्त आप लोग कुछ भी नहीं जानते | इस्लाम की दाकिया नुसी और अमानवीय बात यह है की, आगर खुद को जरूरत पड़े तो दुसरे का अंग प्रतंग लेना जाएज है, चाहे वह काफिरों से ही क्यों ना लेना पड़े | किन्तु अपना बाल तक किसी को देना हराम हैं, चाहे वह किसी मुसलमान को भी नहीं दे सकता, काफिरों को देने का सवाल ही कहाँ हैं ? जानकारी आप को है नहीं अगर कोई सत्य बोल रहा है उसे झुठलाना ही आप जैसों का काम है |
इस विषय पर कोई भी मुसलमान हो ईसाई हो या कोऊ भी पौराणिक हिन्दू सत्यता पर डिबेट करना चाहता है तो उसका स्वागत है सामने आये डिबेट के लिये महेन्द्र पाल आर्य स्वागत के प्रतीक्षा में = 19 /6/19=
|| इस्लाम की मान्यता ही जिहालत है ||
इसलाम नाम है अन्ध विश्वास और कुसंस्कार का, कारण कोई भी सवाल नहीं किया जा सकता है जो बोला गया उसे आँख बन्द कर, मानने का नाम, या समर्पण करने का नाम ही इसलाम है | जिसे आप पूर्ण समर्पण कहते हैं, जो कुछ बताया गया उसे दिल से स्वीकार करना और जुबान से इकरार का नाम है इस्लाम | इसका जो कोई दूसरा अर्थ करता है, की इस्लाम का अर्थ शांति है अमन है, जो भारत के प्रधान मंत्री ने भी कहा है | यह अर्थ गलत है | सही अर्थ है अल्लाह के सामने अपने को समर्पण कर देना |
इसमें किसी भी प्रकार का कोई भी सवाल खड़ा नहीं कर सकता या इसलाम में नहीं चल सकता, अतः सही अर्थ :-अपने को अल्लाह के पास सोंप देना | सरेन्डर कर देना आदि |
अब हम देखते हैं इस सोपने में जिहालत, मुर्खता को, इस्लाम की मान्यता है अल्लाह जो चाहता है वह करता है | जिहालत यह है की इन्हों ने दुनिया बनाने वाले को जाना ही नहीं, अल्लाह के नाम से एक भ्रम पाल रखा है | कारण जो दुनिया का बनाने वाला है उसका सारा कामका तरीका है, सिस्ट्म है पद्धति है | जैसा 24 घन्टे का दिन होना, पृथ्वी घूम कर जब सूरज के सामने हो दो दिन कहलाता है | जब पृथ्वी घूम कर सूरज के पीछे हो तो रात कहलाती है | विज्ञान का मानना है, जिधर से सूरज को हम निकलते देखते हैं, उधर को हम पूर्व कहते हैं | अपितु सुरज निकला नहीं और ना निकलता है, ठीक इसी प्रकार जिधर हम सूरज को डूबता हुवा देखते हैं उधर को हम पश्चिम कहते हैं, किन्तु सूरज न निकलता है और ना डूबता है | पर कुरान इन बातों से सहमत नहीं सूरा कहफ़ =आयत 86 कहता है सूरज को कीचड़ वाला तालाब में डूबता हुवा देख गया |
अब इसमें जिहालत और मुर्खता यह है की अल्लाह जो चाहता है करता है, किन्तु कुरान में ही इसका विरोध है | अल्लाह ने चाहा शैतान को आदम के सामने सिजदा करवाना, और हुक्म भी दिया सिजदा करने का, शैतान ने उसे इनकार किया, और उसी अल्लाह को ही चुनौती दे दिया | फिर अल्लाह के चाह पर ही सवाल खड़ा हो गया, पर इसलाम के मानने वालों को सवाल करने की हिम्मत ही नहीं है इसे मानना ही पड़ेगा अल्लाह की निकम्मेपन को | दूसरा प्रमाण है उसी अल्लाह ने अपने अरमान से बनाये गये धरती का पहला मानव आदम को, अल्लाह ने उसे मना किया एक फलको ना खाना, और उस आदम ने पति पत्नी दोनों ही खाए अल्लाह नहीं रोक पाया | इसपर भी कोई मुसलमान सवाल नहीं कर सकता जो है सो मानना ही पड़ेगा सवाल पूछ ना इस्लाम में उच्चित नहीं मना है | तो इंसान के अक्ल कहाँ है उससे काम कब लेना है ? इसी लिए इस्लाम एक अन्धविश्वास का नाम है अगर देखें |
अभी फस्बुक में एक शमशाद अलि -11 jun – रात्रि 9 pm पर एक विचचार लिखा अपना | लिखा =अरे नादानों, यह सभी गैर इस्लामियों के लिए लिखा है |
जबसे हम वजुद में आये, तबसे दुनिया बाकि रहेगी, तबतक एक अटल नियम है, की जबतक हमारी फजर की नमाज का वक्त तमाम नहीं हो जाता – तब तक सूरज निकल ही नहिय सकता – यानि सुबह उठकर जब हम अपनी इबादत से फाखिर हो जाते हैं, तब सूरज निकलकर हमें सलाम करता है | और अप हमें सिखा रहे हो, की हम आप का नमस्कार करें जो निकलने से पहले इंतज़ार करता है हमारी नमाज का वक्त खत्म हिने का |
इस जाहिल को मैंने यह उत्तर लिखा है, और सम्पूर्ण इस्लाम के मानने वालों को यह मेरी चुनौती है आये जिसके अंदर इल्म है वह सामने आयें | इस्लाम सत्य है यह प्रमाणित करने के लिए इस्लाम सत्य से बहुत दूर है इस्लाम झूठ का पुलिंदा है | जिहालत और अन्ध विश्वास का नाम ही इस्लाम है | { कौन आ रहा है सामने आव }
अरे मुर्ख अगर तेरे फजर की नमाज ख़त्म ना होने तक सूरज नहीं निकल सकता अगर तेरी बात अगर सच है गधे यह बता की जब नमाज नाजिल नहीं हुईथी मुहम्मद जब मेराज को नहीं गये थे तो क्या उस समय सूरज नहीं निकलती थी ? तुम जाहिल के जाहिल हो रहोगे नालायक हम लोग सूरज के लिए हैं, की सूरज हमारे लिए है मुर्ख ?
एक मुर्ख और यह निकला राम कुमार तिवारी ||
भाई राम कुमार तिवारी जी वेदानन्द ओझा जी की बात आप को बेसिर पैर की लगी | धन्यवाद आप एक चिन्तन शील व्यक्ति लगते हैं और पढ़ाकू भी लगते हैं | पर आप को बेसिर,पैर का तो पता है = किन्तु धड़ और दिल का पता नहीं है ? कारण इस्लाम में अंग तो क्या सर के बाल तक दुसरे को देना हराम है, चाहे वह मुसलमान को ही क्यों ना दे | क्या आप को इसबात की जानकारी है ? आप जैसों का काम है सत्य पर पर्दा डालना इसके अतिरिक्त आप लोग कुछ भी नहीं जानते | इस्लाम की दाकिया नुसी और अमानवीय बात यह है की, आगर खुद को जरूरत पड़े तो दुसरे का अंग प्रतंग लेना जाएज है, चाहे वह काफिरों से ही क्यों ना लेना पड़े | किन्तु अपना बाल तक किसी को देना हराम हैं, चाहे वह किसी मुसलमान को भी नहीं दे सकता, काफिरों को देने का सवाल ही कहाँ हैं ? जानकारी आप को है नहीं अगर कोई सत्य बोल रहा है उसे झुठलाना ही आप जैसों का काम है |भाई राम कुमार तिवारी जी वेदानन्द ओझा जी की बात आप को बेसिर पैर की लगी | धन्यवाद आप एक चिन्तन शील व्यक्ति लगते हैं और पढ़ाकू भी लगते हैं | पर आप को बेसिर,पैर का तो पता है = किन्तु धड़ और दिल का पता नहीं है ? कारण इस्लाम में अंग तो क्या सर के बाल तक दुसरे को देना हराम है, चाहे वह मुसलमान को ही क्यों ना दे | क्या आप को इसबात की जानकारी है ? आप जैसों का काम है सत्य पर पर्दा डालना इसके अतिरिक्त आप लोग कुछ भी नहीं जानते | इस्लाम की दाकिया नुसी और अमानवीय बात यह है की, आगर खुद को जरूरत पड़े तो दुसरे का अंग प्रतंग लेना जाएज है, चाहे वह काफिरों से ही क्यों ना लेना पड़े | किन्तु अपना बाल तक किसी को देना हराम हैं, चाहे वह किसी मुसलमान को भी नहीं दे सकता, काफिरों को देने का सवाल ही कहाँ हैं ? जानकारी आप को है नहीं अगर कोई सत्य बोल रहा है उसे झुठलाना ही आप जैसों का काम है |
इस विषय पर कोई भी मुसलमान हो ईसाई हो या कोऊ भी पौराणिक हिन्दू सत्यता पर डिबेट करना चाहता है तो उसका स्वागत है सामने आये डिबेट के लिये महेन्द्र पाल आर्य स्वागत के प्रतीक्षा में = 19 /6/19=