ईश्वर को लोगों ने मानव जैसा समझने की हिमाकत की है |

||ईश्वर को लोगों ने मानव समझा है ||

जब लोग ईश्वर को मानव जैसा जानने और समझने लगते है वही चुक होती है |
दरअसल ईश्वर को मानव समझने के कारण ही लोग ईश्वर के साथ इन्ही शब्दों को जोड़ते हैं, की ईश्वर जब सब जगह है तो मल,मूत्र में भी है, फिर ईश्वर पवित्र क्यों और कैसे हो सकते हैं ?

जैसा की कल आप लोगों ने विडिओ में सुना बरेली से एक मुस्लिम लड़के ने सवाल किया था फोन पर | और उसने यहाँ तक कहा की ईश्वर अगर गंदगी में आप मान रहे हैं तो ईश्वर को आप गाली दे रहे हैं, कारण ईश्वर के नाक में गंदगी का लगना यह तो उसकी मर्यादा के विपरीत हैं |

उसने मेरी बात को सुनना नहीं चाहा, दरअसल बात यह है की ईश्वर मानव जैसा नहीं है | ईश्वर रूप -रस – गंध – शब्द – व स्पर्श = इन पांचों से अलग है | जब गंध अर्थात घ्राण लेने से वह अलग है फिर उसे गन्ध लगने का क्या मतलब ? जब शारीर धारी भी नहीं है तो उसे साँस लेने का क्या काम |

यह समझें की हवा सब जगह है अथवा नहीं ? जब हवा सब जगह है चाहे वह शौचालय में हो अथवा कहीं किसी कमरे में, या फिर खुली जगहों में |

जैसा हवा सब जगह है तो क्या हवा को यह महसूस होता है, की वह शौचालय में बह रही है, अथवा किसी फुल के बगीचे में बह रही है ? जैसा हवा को पता नहीं है की वह कहाँ बह रही है, ठीक इसी प्रकार परमात्मा के साथ भी उस घ्राण, अर्थात सूंघने की गुण नहीं है | वह मानव का काम है की वह हवा कहाँ का ले रहा है, बगीचे की अथवा शौचालय की ?

सवाल तो पूछते हैं किन्तु सुनने की ताकत नहीं सुनना ही नहीं चाहता, तो फिर सवाल किस लिए पूछते हो ? जब जवाब सुनना ही नहीं है कुतर्क देना आ जाते हैं जिसका कोई तुक ही नहीं है |

इसलिए आज मैं सब को यह सुचना दे रहा हूँ की अगर मेरे से कोई सवाल पूछता है तो वह सुनने की भी हौसला रखे | अगर सुनना नहीं है तो मुझसे सवाल ही ना पूछें | जहाँ तक बात अपशब्द की है अगर कोई असभ्यता से बात करेगा तो मैं भी उनसे असभ्यता से जवाब दूंगा | और कोई असभ्यता से बात करता है बत्तामीजी करता है तो वह भी मुझसे सभ्यता की आशा ना रखें, कराण मेंरी मान्यता है जैसे को तैसा जवाब देने की |

मैं उस मान्यता को नहीं मानता की कोई एक गाल में चांटा मारे तो दूसरा गाल बढ़ा तो | यह कायराना हरकत है, और यह ऋषि दयानन्द की मान्यता भी नहीं है इसे जरुर याद् रखना चाहिए | ऋषि ने यथायोग्य वर्तना बताया है, और, अपने जीवन में किया भी है | किसी नरेश ने ऋषि पर तलवार ठान ली थी, ऋषि ने लपककर उसकी तलवार छीन ली और दो टुकड़ा कर दिया | दो पहलवान को दोनों बगल में दबाकर वाराणसी की गँगा में डुबो डूबो कर खूब गँगा जल पिला दिया जो गँगा के पानी को अशुद्ध मानते थेें |

योगेश्वर श्री कृषण जी के जीवन से भी हमें यह शिक्षा लेनी चाहिए, जिन्हों ने अर्जुन को उपदेश दिया था | ईमेपाप: वध्य एव = लम्बी वार्ता है =की यह पापी है दुष्ट हैं वध करने योग्य है | आज हमारे शाषक अगर श्रीकृष्ण जी के उपदेश को अपने आचरण को अपने जीवन में उतारते तो राष्ट्र विरोधियों का हौसला बुलन्द नहीं होता |

जो लोग इसी राष्ट्र में रहते हैं और इसी राष्ट्र का विरोध करते हैं उन्हें एक एक कर बुलडोजर से मिटटी में मिला देना चाहिए, अगर दो चार के साथ ऐसा हो जाय फिर दूसरा कोई सर उठाने की हिम्मत नहीं करेगा | यह है नीति कृष्ण की इसे ही ऋषि दयानन्द ने बताया और करके भी दिखाया था | हमें भी इसी निति को अपना कर इस राष्ट्र की रक्षा करना चाहिए | आप सब राष्ट्र वासियों को महेन्द्र पाल आर्य की तरफ से यही सुचना है |
राष्ट्रिय प्रवक्ता राजार्य सभा = 11 /9 /18 =