ऋषि के मंतव्यों को लोगों ने नही समझा 

सृष्टि के प्रथम से ही अनेकों महापुरुषों का आगमन हुवा अनेकों ऋषि महर्षि, और ऋषिकायें इसी धरती पर आयें, अनेकों मुनियों का भी आगमन हुवा,फिर महा पुरुष भी आयें,सबने मानवता का ही सन्देश दिया मानवता क्या है उसका बोध मानव मात्र को कराया | हमारे जितने भी ऋषि, मुनि,महात्मा, इस धरतीपर आयें सबने परमात्मा के हम सब अमृत पुत्र हैं वेद के आधार पर सबने प्रचार किया, अर्थात जितने भी उपदेश उनलोगों का हुवा सब ने मात्र वेद को सामने रख कर मानव, और मानवता की बातें की हैं |

इसका मूल कारण है परमात्मा जो सृष्टिकर्ता, स्थितिकर्ता, और प्रलयकर्ता, और मानव मात्र के किये कर्मों का फल दाता हैं, जिसके पास किसी प्रकार का भेद नही है, जो प्राणी मात्र को समान रूप से अपनी सृष्टि के सभी वस्तुओं को भोगने का समान अधिकार दिया है | अर्थात परमात्मा की रचनाओं में जो कुछ भी है, पृथ्वी में, जैसा आकाश, वायु, जल, सूर्य, चन्द्रमा, वनस्पतियाँ जितने भी हैं धरती पर सब को.परमात्मा ने लाभ उठाने का पूरा अधिकार दिया है | यह नही की सूरज किसी के लिए प्रकाश दे और किसीके लिए ना दे, अथवा हवा किसी को दे और किसी को ना दे यह भेद परमात्मा में नही है, यह परमात्मा का स्वाभाविक गुण है | जो परमात्मा पक्षपात करे अपनी सृष्टि रचना में यानि प्राणी मात्र को समान रूपसे ना दे, तो परमात्मा का होना संभव नही, परमात्मा वही है जो किसी भी प्रकार का दोष नही लगे,वरना परमात्मा का होना, कहलाना यह संभव नही, यही उपदेश आदि सृष्टि से हमारे जिंतने भी ऋषि मुनि महात्मा गण आये सबने यही उपदेश दिया है |

इन्ही बातों को सामने रखकर ऋषि दयानन्द सरस्वती जी ने अपने मन्तव्य को किस प्रकार दर्शाया है वह मानव मात्र को समझना चाहिए | ऋषि ने सबसे पहले लिखा है ईश्वर कौन है मैं किसे ईश्वर मानता हूँ ईश्वर में गुण क्या है आदि |

ईश्वर= कि जिसको ब्रह्म,परमात्मादी नामों से कहते हैं, जो सच्चिदानान्दादी, लक्षणयुक्त है जिसके गुण, कर्म, स्वभाव पवित्र है जो सर्वज्ञ, निराकार, सर्वव्यापक, अजन्मा, अनन्त, सर्वशक्तिमान्, दयालु,न्यायकारी सब सृष्टि का कर्ता, धर्ता, हर्ता, सब जीबों को कर्मानुसार, सत्य न्याय से फलदाता आदि लक्ष्णयुक्त है मैं उसी को परमेश्वर मानता हूँ |

ऋषि के मन्तव्य कितना स्पस्ट है देखें जो सही अर्थों में विचारणीय है, अगर परमेश्वर को मानव.कहलाने वाले जानते समझते, तो फिर आज जो, परमेश्वर के नाम से विशेष कर मानव कहलाने वाले उस. परमेश्वर के नाम से जो झगड़ा कर रहे हैं यह करना ही नही पड़ता | अर्थात आज मानव समाज में विशेष कर जो वर्तमान समय में जगत भर जो आतंकवाद छिडा है वह मात्र अल्लाह के नाम से ही है |           सभी अल्लाहुअकबर का नारा लगा रहे हैं चिल्ला, चिल्ला, कर अल्लाह का नाम ले रहे हैं आदि, इसके बाद भी कोई यह कहे की आतंकवादीयों का कोई धर्म नही होता, तो यह शब्द गले के नीचे उतरने वाली नही है | यहाँ सबसे पहले विचारणीय बात यह है कि, क्या जो लोग अल्लाह का नाम लेकर कत्लेआमकर   रहे हैं, अथवा खुद मारे जा रहे हैं, यह काम अल्लाह का है,या यह लोग सिर्फ उस अल्लाह का नाम ही ले रहे हैं ? पर यह सवाल आज का नही है बल्कि यह सवाल हर मत और पन्थ के जन्मलेने के साथ साथ से ही है | कारण मत और पन्थ का जन्म होता ही है इस कारण कि एक दुसरे से सहमत नही हैं, अगर सहमती होती तो दूसरा मत,या पन्थ का जन्म ही नही होता |

जैसा बौद्ध मतका जन्म हुवा, तो इससे जैन मत वाले सहमत नही थे, अगर सहमत होते तो उन्हें फिर दूसरा जैनमत को चलाना या जन्म देना नही पड़ता | ठीक इसी प्रकार, आज धरती पर जितने भी यह मत मतान्तर हैं सब का जन्म इसी कारण हुवा है, की अगर तुम अपना चला सकते हो तो मैं क्यों.नही?  पर इतना ध्यान रखना की यह जो दोनों मत हैं, यह परमात्मा पर आस्था नही रखते अथवा परमात्मा को नही मानते |

किन्तु ईसाई, और इस्लाम यह दोनों ही परमात्मा को मानते हैं, और खूबी कीबात यह भी है की यह दोनों ही मत, यानि ईसाई, और इस्लाम यह दोनों परमात्मा को अनेक नही,एक ही है मानते हैं |   अर्थात बाईबिल कहता है गॉड एक है, और कुरान भी कहता है, अल्लाह एक है वह्दहू लाशारिक है,यानि वह एह ही है जिसका कोइ शरीक {भागीदार} हीनही है | बाईबिल कहता है कि वह गॉड निराकार है, और इधर कुरान भी कहता है कि वह ला मुजस्सिम {निराकार} ही है |

जब इन दोनों में गॉड,और अल्लाह के बारे में समानता है तो दोनों का एक होना संभव क्यों नहीं ? यहाँ एक और बात भी है दोनों ने ही कलामुल्ला {ईश्वानी} को माना है, किन्तु दोनों ने अलग, अलग,ही माना  पर आश्चर्य की बात यह है की जब दोनो ने गॉड, या अल्लाह को अनेक नही एक ही माना है, तो दोनों  का ग्रन्थ अलग, अलग होना या मानना यह किसलिए उचित हुवा ? यही सवाल ऋषि दयानन्द जी का है और उन्हों ने पहले उसी ईश्वर के बारे में बताया की ईश्वर कौन है ?या मैं किन्हें ईश्वर मानता हूँ आदि|  कारण ईश्वर एक है तो उसका उपदेश भी तो एक ही होना चाहिए,बराबर होना चाहिए ?अगर बराबर.नही तो ऋषि दयानन्द की मान्यता है अथवा मानवता कि तकाजा है, की उसका गॉड,या अल्लाह तो होना संभव है, किन्तु परमात्मा होना संभव नही | कारण यह जो दोष गॉड,या अल्लाह पर लगा है, की वह एक होकर भी दोनों को यानि ईसाईयों को और मुसलमानों को ज्ञान अलग, अलग, दिया यह दोष है, और यह दोष परमात्मा पर लगना, लगाना संभव ही नही है |

कारण उपर बताया गया की किसी प्रकार का दोष परमात्मा पर लगना संभव ही नही है कारण परमात्मा, कौन है,क्या क्या गुण परमात्मा में है जिन गुणों के कारण ही वह परमात्मा हैं वह उपर ही दर्शाया गया है जिसे ऋषि ने अपने मन्तव्यों को मानव समाज के सामने रखा है और यह सन्देश दिया है कि हम मानव कहलाने के अधकारी तभी बनसकते हैं जब की हम सही सही परमात्मा को जान कर ही उसे मानें अगर हमने परमात्मा को नही जाना तो उसका मानना भी संभव नही और ना उचित ही है |

महेन्द्रपाल आर्य= वैदिक प्रवक्ता