कुरानी अल्लाह नहीं जानते बाँझ किसे कहते हैं ?

|| कुरानी अल्लाह नहीं जानते बाँझ किसे कहते ||
इस्लाम जगत के लोगों की मान्यता है की, कुरान विज्ञान का भंडार है, और दुनिया में ऐसी विज्ञानं की कोई किताब ही नहीं है जिसे अल्लाह ने मुसलमानों को दिया |
आइये हम मानव कहलाने वाले जो धरती पर अकल्मन्द और बुद्धिमान कहलाते हैं, और परमात्मा ने हमें सबसे उत्कृष्ट प्राणी बताया सिर्फ और सिर्फ अकलमंद होने के कारण | तो क्या हमारी यही अक्लमंदी ही की हाँ ऐसी बेतुकी बातों को सत्य मानें जहाँ एक बुढा अपनी बाँझ औरत से संतान को जन्म दे ? जब की दुनिया के लोग बाँझ उसे ही कहते हैं जो महिला कभी भी संतान जन्म ना दे सके दुनिया के लोग उसे ही बाँझ कहते हैं, किन्तु कुरानी अल्लाह उसी बाँझ महिला से संतान पैदा करदेते हैं | यह सृष्टि नियम विरुद्ध, विज्ञानं विरुद्ध बातें जहाँ लिखी और बताई गई हो उसी किताब या पुस्तक को ईश्वरीय ज्ञान मानना क्या यही अक्लमंद कहलाने वालों का काम है ? निचे पूरण प्रमाण के साथ लिखा हूँ इसे आप लोग ध्यान से पढ़ें और विचार करें सही में ईश्वरीय ज्ञान की कसौटी में यह खरा उतर रहा है क्या ? يَا زَكَرِيَّا إِنَّا نُبَشِّرُكَ بِغُلَامٍ اسْمُهُ يَحْيَىٰ لَمْ نَجْعَل لَّهُ مِن قَبْلُ سَمِيًّا [١٩:٧]
खुदा ने फरमाया हम तुमको एक लड़के की खुशख़बरी देते हैं जिसका नाम यहया होगा और हमने उससे पहले किसी को उसका हमनाम नहीं पैदा किया | सूरा 19 मरियम= 7
قَالَ رَبِّ أَنَّىٰ يَكُونُ لِي غُلَامٌ وَكَانَتِ امْرَأَتِي عَاقِرًا وَقَدْ بَلَغْتُ مِنَ الْكِبَرِ عِتِيًّا [١٩:٨]
ज़करिया ने अर्ज़ की या इलाही (भला) मुझे लड़का क्योंकर होगा और हालत ये है कि मेरी बीवी बाँझ है और मैं खुद हद से ज्यादा बुढ़ापे को पहुँच गया हूँ | आयत 8
قَالَ كَذَٰلِكَ قَالَ رَبُّكَ هُوَ عَلَيَّ هَيِّنٌ وَقَدْ خَلَقْتُكَ مِن قَبْلُ وَلَمْ تَكُ شَيْئًا [١٩:٩]
(खुदा ने) फ़रमाया ऐसा ही होगा तुम्हारा परवरदिगार फ़रमाता है कि ये बात हम पर (कुछ दुशवार नहीं) आसान है और (तुम अपने को तो ख्याल करो कि) इससे पहले तुमको पैदा किया हालाँकि तुम कुछ भी न थे | आयत = 9
قَالَ رَبِّ اجْعَل لِّي آيَةً ۚ قَالَ آيَتُكَ أَلَّا تُكَلِّمَ النَّاسَ ثَلَاثَ لَيَالٍ سَوِيًّا [١٩:١٠]
ज़करिया ने अर्ज़ की इलाही मेरे लिए कोई अलामत मुक़र्रर कर दें हुक्म हुआ तुम्हारी पहचान ये है कि तुम तीन रात (दिन) बराबर लोगों से बात नहीं कर सकोगे | आयत 10
فَخَرَجَ عَلَىٰ قَوْمِهِ مِنَ الْمِحْرَابِ فَأَوْحَىٰ إِلَيْهِمْ أَن سَبِّحُوا بُكْرَةً وَعَشِيًّا [١٩:١١]
फिर ज़करिया (अपने इबादत के) हुजरे से अपनी क़ौम के पास (हिदायत देने के लिए) निकले तो उन से इशारा किया कि तुम लोग सुबह व शाम बराबर उसकी तसबीह (व तक़दीस) किया करो|आयत 11
يَا يَحْيَىٰ خُذِ الْكِتَابَ بِقُوَّةٍ ۖ وَآتَيْنَاهُ الْحُكْمَ صَبِيًّا [١٩:١٢]
(ग़रज़ यहया पैदा हुए और हमने उनसे कहा) ऐ यहया किताब (तौरेत) मज़बूती के साथ लो | 12
وَحَنَانًا مِّن لَّدُنَّا وَزَكَاةً ۖ وَكَانَ تَقِيًّا [١٩:١٣]
और हमने उन्हें बचपन ही में अपनी बारगाह से नुबूवत और रहमदिली और पाक़ीज़गी अताफरमाई|13
وَبَرًّا بِوَالِدَيْهِ وَلَمْ يَكُن جَبَّارًا عَصِيًّا [١٩:١٤]
और वह (ख़ुद भी) परहेज़गार और अपने माँ बाप के हक़ में सआदतमन्द थे और सरकश नाफरमान न थे | आयत =14