कुरान का एक ही आयात से ईश्वरीय ज्ञान ना होने का प्रमाण

||कुरान का एक ही आयात से ईश्वरीय ना होने का प्रमाण ||
كَانَ النَّاسُ أُمَّةً وَاحِدَةً فَبَعَثَ اللَّهُ النَّبِيِّينَ مُبَشِّرِينَ وَمُنذِرِينَ وَأَنزَلَ مَعَهُمُ الْكِتَابَ بِالْحَقِّ
لِيَحْكُمَ بَيْنَ النَّاسِ فِيمَا اخْتَلَفُوا فِيهِ ۚ وَمَا اخْتَلَفَ فِيهِ إِلَّا الَّذِينَ أُوتُوهُ مِن بَعْدِ مَا جَاءَتْهُمُ الْبَيِّنَاتُ بَغْيًا بَيْنَهُمْ ۖ فَهَدَى اللَّهُ الَّذِينَ آمَنُوا لِمَا اخْتَلَفُوا فِيهِ مِنَ الْحَقِّ بِإِذْنِهِ ۗ وَاللَّهُ يَهْدِي مَن يَشَاءُ إِلَىٰ صِرَاطٍ مُّسْتَقِيمٍ [٢:٢١٣]
(पहले) सब लोग एक ही दीन रखते थे (फिर आपस में झगड़ने लगे तब) ख़ुदा ने नजात से ख़ुश ख़बरी देने वाले और अज़ाब से डराने वाले पैग़म्बरों को भेजा और इन पैग़म्बरों के साथ बरहक़ किताब भी नाज़िल की ताकि जिन बातों में लोग झगड़ते थे किताबे ख़ुदा (उसका) फ़ैसला कर दे और फिर अफ़सोस तो ये है कि इस हुक्म से इख्तेलाफ किया भी तो उन्हीं लोगों ने जिन को किताब दी गयी थी और वह भी जब उन के पास ख़ुदा के साफ एहकाम आ चुके उसके बाद और वह भी आपस की शरारत से तब ख़ुदा ने अपनी मेहरबानी से (ख़ालिस) ईमानदारों को वह राहे हक़ दिखा दी जिस में उन लोगों ने इख्तेलाफ डाल रखा था और ख़ुदा जिस को चाहे राहे रास्त की हिदायत करता है | सूरा बकर 2 /213
 
समीक्षा :- {आयात उतरने का सन्दर्भ } इस आयात के सन्दर्भ में, हज़रत इबने अब्बास का बयाँन है की, हजरत नुह, और हजरत आदम, {यह दोनों पैगम्बरथे} इन दोनों के दरम्यान {बीच} दस ज़माने {काल} का अंतर {दुरी} थी इन जमाने के लोग हक़ और शरीयत {लम्बी सड़क} कानून के पाबन्द{मानने वाले} थे फिर इख्तेलाफ{विरोध} पड़ गया | तो अल्लाह तयला ने अम्बिता {नबी} अलैहिस्सलाम को मबयुस {उठाना } या उठाया गया, बल्कि आप की किरात {कुरानका पढना } भी यूँ है | कलामें खुदा > कानन्नासो उम्मातन वाहे दतन फ्खत्लाफु }
यही हजरत अबी बिन कयब रज़ी अल्लाह अन्हा का भी मानना है | कितादह रज़ीअल्लाहु अन्हा, ने इसकी तफसीर इस तरह की है के, जब इनमें इखतलाफ {विरोध} पैदा हो गया तो अल्लाह तयला ने अपना पहला पैगम्बर भेजा हजरत नुह अलैहिस्सलाम {एक पैगम्बर का नाम } हजरत मुजाहिद भी यही कहते हैं | हजरत अब्दुल्लाह बिन अब्बास कहते हैं एक रवायत में के पहले सबके सब काफ़िर थे | लेकिन अव्वल {प्रथम} कौल {इकरार} से और सनद {प्रमाण} के दृष्टि से ज्यादा सही है | अल्लाह की किताब भी थी ताके लोगों के हर इख्तिलाफ का फैसला कानुने इलाही से हो सके |
हुजुर सललाल्लाहू अलैहे वसल्लम ने फरमाया, हम दुनिया में आने के इयत्बार {दृष्टि} से सबसे पीछे हैं | लेकिन कयामत के दिन जन्नत में जाने के इयत्बार {दृष्टि} से हम सबसे आगे {पहले} होंगे | अहले किताब को किताबुल्लाह हमसे पहले दी गई, हमें इनके बाद दी गई, लेकिन उन्हों ने इख्तिलाफ {विरोध} किया और अल्लाह ने हमारी रहबरी {हिदायत} उपदेश रास्ता दिखाया |
 
नोट :- { तफसीरे इबने कसीर के पेज नो० 351 में यह लिखा है } इससे आप सभी यह समझ सकते हैं निर्णय कर सकते हैं अथवा निर्णय ले सकते हैं, की सही में यह कुरान ईश्वरीय ज्ञान हो सकता है क्या ? कितना विरोधाभाष, और पक्षपात पूर्ण बातें है | की इसमें लिखा है, हज़रत मुहम्मद साहब खुद कह रहे हैं की दुनोया में आने के लिए तो मैं सब से आखिर {अन्तिम} पैगम्बर के रूप में आया, किन्तु कयामत के दिन हम सबसे आगे और पहले होंगे |
 
यहाँ कई प्रशन खड़े होते हैं,पहला प्रश्न तो यह है की, यह बातें उन्हें कैसे पता लगा की वह सबसे पहले होंगे ? कारण अलेमूल गैब { अदृश्य की बातों का जानने वाला } अल्लाह ही है कुरान के मुताबिक | तो क्या अल्लाह ने मुहम्मद {स} को यह बातें बताया कि तुम सबसे पहले जाव गे जन्नत में ? अगर बताया तो अल्लाह और पैगम्बरों के साथ न्याय किया अथवा अन्याय ? अब सवाल होगा अगर यह पक्षपात अल्लाह का हो तू उस अल्लाह के बन्दों का क्या हाल होता होगा ? जो आज दुनिया के सामने मौजूद हैं | =महेन्द्रपाल आर्य,3,11,18