कुर आन की शुरुयात ही गलत है = प्रमाण के साथ

|| कुरआन की शुरुयात ही गलत है ||

ऋषि दयानन्द जी ने इस भेद को खोला इससे पहले भी बहुत लोगों ने कुरान ईश्वरीय ना होने का प्रमाण दिया है, जिसमें बहुत विद्वानों का नाम हैं ईतिहास का पन्नों में |

किन्तु ऋषि दयानन्द जी ने जो प्रमाण दिया है वह अकाट्य है और इसका ज़वाब आज तक इस्लाम जगत के यालिमों द्वारा दिया जाना सम्भव ही नहीं हुवा | और प्रलय तक दिया जाना इन लोगों के लिए सम्भव भी नहीं होगा |

कुछ मुसलमानों का कहना है की अल्लाह ने हमें कहा तुम इसे बोल कर कुरान को पढो अथवा किसी भी काम करने लगो इस को बोल कर करो आदि |
सवाल यह है की यह वाक्य कलामुल्लाह है अथवा नहीं ? कलामुल्लाह मानी अल्लाह ने कही अल्लाह ने बोला बताया आदि | अगर अल्लाह ने यह वाक्य बोला है तो अर्थ वही होगा जो हमारे बोलने पर होगा | अल्लाह के बोलने से अर्थ बदलेगा नहीं |

बोला क्या है अल्लाह ने = शुरू करता हूँ अल्लाह के नाम से = अल्लाह ने यह नहीं कहा की तुमलोग शुरू करो मेरे नाम से – यह वाक्य जब नहीं है तो यह कहना कहाँ सत्य हो सकता है की अल्लाह ने मनुष्यों को या मुसलमानों को कहा की मेरे नाम से शुरू करो ?

अल्लाह ने सीधा सपाटा बोला है शुरू करता हूँ मैं अल्लाह के नाम से =इसी लिए सवाल खड़ा हो गया की किस अल्लाह ने किस अल्लाह के नाम से शुरू किया ? अगर कोई यह कहें की यह कलामुल्लाह नहीं है, यह कहना भी सम्भव नहीं कारण 114 बार, बोला गया है 113 सूरा के प्रथम इसी वाक्य से है |

सूरा तौबा यह वाक्य से शुरू नहीं है, किन्तु सूरा नमल के मध्य में बोला गया | इस लिए यह कहना भी सम्भव नहीं होगा की यह वाक्य अल्लाह के नहीं है ? दूसरी बात इस्लाम जगत के अनेक भाष्यकारों ने इसे कुरान की ही आयत माना है | इबने कसीर में भी स्पष्ट माना है, अशरफ अलि थानवी ने भी माना है और भी अनेकों ने माना है |

सामने बैठने पर मैं प्रमाणों की फुल झरी लगा दूंगा | अलीगढ़ विश्वविद्यालय के प्रोफेसर = डॉ० तारिक मुर्तुजा के साथ मेरा डिबेट हुवा इस पर 27 मार्च 2007 को | निरुत्तर रहे वह बेचारे | कुरान में अनेक सूरा है जो इसी बिस्मिल्लाह से शुरू होकर आयात एक बताया गया = एक प्रमाण देरहा हूँ =सूरा 5 मायदा =कहाँ से कहाँ तक एक आयात है उसे देखें इस प्रकार अनेक प्रमाण कुरान में ही मौजूद हैं जैसा यह > بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَٰنِ الرَّحِيمِ
۞ يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا أَوْفُوا بِالْعُقُودِ ۚ أُحِلَّتْ لَكُم بَهِيمَةُ الْأَنْعَامِ إِلَّا مَا يُتْلَىٰ عَلَيْكُمْ غَيْرَ مُحِلِّي الصَّيْدِ وَأَنتُمْ حُرُمٌ ۗ إِنَّ اللَّهَ يَحْكُمُ مَا يُرِيدُ [٥:١]