क्या दुनिया बनाने वाले ने मानवों में भेद किया ?

क्या दुनिया बनाने वाले मानवों मेंभेद किया ?

यह सत्य पहले से उजागर है की कोई भी वस्तु अपने आप नही बनती उसका कोई भी बनाने वाला जरुर है | आर्य समाज के प्रवर्तक ऋषि दयानन्द जी ने अपने अमर ग्रन्थ सत्यार्थ प्रकाश में लिखा, की मात्र बनाने वाले हों तो नही बन सकती, किसी भी वस्तु को बनने के लिए तीन की जरूरत होती है |

वह क्या क्या है इसको भली प्रकार जानना, और समझना चहिये, एक बनाने वाला, दूसरा जिस से  बनाया जायेगा, और तीसरा वह जिसके लिए बनाया जाय |

 

इसे ऋषी ने ईश्वर, प्रकृति, और जीव,लिखा है, की यह तीनों चीज अनादी हैं, यानि इनका बनाने वाला कोई नही वह पहले था,अब भी है,औरआगे भी रहेगा,यह तीन चीजें न कभी मरती है, और न कभी बनती है, और न इसका कोई बनाने वाला है | अर्थात ईश्वर को किसी ने नही बनाया, जीवात्मा को, किसीने नही बनाया, और प्रकृति को भी किसी ने नही बनाया,यह तीन वस्तुएं अनादी है, यानि इसका प्रारम्भिक काल नही है |  पहले था अब है और आगे भी इसे रहना है |

 

यही कारण है की यह तीनों की मृत्यू भी नही है, बनाने वाले नही मरते,जिस चीजसे बनाई गई वह भी नही मरती,और जिसके.लिए बनाई गई जीवात्मा भी नही मरती  |

 

जैसे ऋषि ने लिखा कुम्हार, मिटटी, और चाक, मिटटी का जो सामान बनाता है, कुम्हार, जो मिटटी से सामान बनी, और जिस चाक के माध्यम से बनाई गई | यह तीनों अनादी है पहले से है और इसका नाश भी नही है |

यह हर जगह इन तीनों की जरूरत होती है, दुकानदार, खरीदार, व बेचने वाली वस्तु, इसके बिना दुकान का चलना संभव नही |

 

पूजा करने वाला, जिसकी पूजा की जाय.और पूजा की सामग्री | ठीक इसी प्रकार, नमाजी, जिसके लिए नमाज पढ़ी जाय, और नमाज या नमाज की जगह |

 

जैसा मकान, उसके लिए जगह, मकान बनाने वाला या रहने वाला | अर्थात यह तीनों चीज पहले से है और आगे भी इसे रहना है इसका विनाश नही होना है,प्रकृति में सिर्फ बदलाव होना है नाम में जैसा बीज ,बृक्ष ,काटने पर लकड़ी, तख्ता, तख्ती, टेबल, कुर्सी, खाट, पलंग, जलावन, धुंवा, कोयला, राख, आदि |

मनुष्य बने मात्र पांच चीजों से ? अगर इन पांचों के बगैर किसी को बनाये, तो उस बनाने वाले पर पक्षपात का दोष लगेगा | अर्थात हिन्दू को जिन चीजों से बनाया, क्या मुसलमान को उन्हीं चीजों से नही बनाया ?

अथवा किसी और को, ईसाई, जैनी, बौधी, सिख,  बहाई, आदि जितने भी हैं बनाने वाले ने सबको इन पांचों तत्व से बनाये अथवा सब को अलग, अलग, चीजों से बनाया ?

 

अब कोई यह नही कहसकता की हिन्दू को ही इन पांचों से बनाया, मुसलमान ,सिर्फ मिटटी से बना है, यानि मुस्लमान मात्र एक ही वस्तु या तत्व से ही बना है ?

अथवा ईसाई को बनाने में किसी और वस्तु का प्रोयोग किया है बनाने वाले ने ? क्या ऐसा संभव है, दुनिया का कोई भी मानव कहलाने वाला यह कह सकता है, की हिन्दू, मुसलिम, सिख, ईसाई, को बनाने वाले ने अलग, अलग सामानों से बनाया है, अथवा सब को समान तत्वों से बनाया है ?

इसमें धरती पर कोई ऐसा नही होगा की इन सबका बनाने वाले ने सब को बनाने में अलग सामानों का इस्तेमाल किया हो |

 

अब सवाल खड़ा होता है की दुनिया बनाने वाले ने सभी मानव मात्र को इन्ही पांच चीजों से बनया है, और सबका नाम मानव ही है, तो यह, हिन्दू, मुसलिम, सिख, और ईसाई यह किसने बनाये ?

 

दुनिया बनाने वाले ने तो यह सब बांनाये नही, तो जब एक ही सामान लगे हैं सभी मनुष्य को बनाने में तो बनाने वाले ने तो इन मानवों में भेद किया ही नही, तो यह हिन्दू,मुस्लिम, सिख,ईसाई. का भेद आया कहाँ से ?

 

आज सम्पूर्ण मानव समाज में यह एक अहम् सवाल है, की जब दुनिया बनाने वाले नें मानवों को एक ही प्रकार से बनाया सब को, बनाने में वही सामान का प्रोयोग हुवा, फिर यह नाम अलग, अलग, कैसे पड़ गया ?

 

इन सवालों का जवाब यह है की दुनिया बनाने वाले ने यह भेद मानवों में नही किया, किन्तु कुछ दुकानदारों ने अपनी दुकान चलाने के लिए मानव समाज को, एक दुसरे से अलग करने, और मानव समाज में मत भेद पैदा करने के लिए, किसी ने अल्लाह का नाम लिया, किसी ने, भगवन बताया, और किसी ने गॉड बताकर मानव समाज को मात्र अलग ही नही किया, अपितु लड़ाने का काम किया है, जो आज सम्पूर्ण दुनिया में चल रहा है, हो रहा है, जिसमें हमारा भारत ज्यादा परेशान हैं |

 

इसका कारण भारत मानवता वादी देश है, भारत मानवता पर आस्था रखता है, भारत के मूल लोगों की मान्यता सब को सुखी देखने का है | सब को अपना कुटूम्व {रिश्तेदार} परिवार मानने का है, इसका मूल कारण भी यही है की दुनिया बनाने वाले ने सब को बराबर बनाया हम भेद किसलिए करें ?

 

यही भावना हर भारत के संस्कृति से जुड़े लोगों में मानों बचपन से घुट्टी जैसी पिलाई हुई हैं, और उसी पर अमल करना ही अपना कर्तव्य और दायित्व मानता है तथा उसी पर अमल करने का प्रयास करते हैं |

 

पर याद रखना  सिर्फ, और सिर्फ उन मावतावादी विचार भारत के मूल निवासियों में ही पाया जाना संभव है अन्यों में है |

हमारे वर्तमान भारत के माननीय प्रधान मन्त्री जी इसी को चरितार्थ करने में लगे हैं,जो भारत विरोधियों को सहन नही, और ना तो, उन सेकुलरवादी कहलाने वालों को सहन हो रहा है | और भारत में अस्थिरता पैदा करने के लिए जिसके मन में जो आरहा है वही बोले जा रहे हैं, श्रीमान प्रधान मंत्री जी को |

 

ना तो मर्यादा का ध्यान रख रहे हैं,और ना सम्मान की कोई बात की जा रही, पर आश्चर्य हमें इस बात से है, की जब मनमोहन सिंह जी प्रधान मंत्री रहे,और कोयला विभाग के भी वह मन्त्री थे, जिस विभाग की फाइल ही गूम होगई थी, उस वक्त उनसे किसी ने क्यों नही पुछाथा ?

 

इसका जवाब किनके पास है राशिदअल्वी के पास, अथवा आनन्द शर्मा के पास, याफिर शकील अहमद के पास? यह तो हम भारत वासियों का सौभाग्य है की इतने वर्षों के बाद हमें आज एक राष्ट्रवादी प्रधान मंत्री मिले हैं |

लालबहादुर शास्त्री जी, और,चौधरी चरण सिंह जी के बाद अगर भारत का बागडोर किसी भारतीय को मिला है, तो वह श्रीमान नरेन्द्र भाई मोदी जी को ही मिला है,की जिनके अन्दर राष्ट्रवाद को जन्म घुट्टी जैसी पिलाई गयी हो | वरना गाँधी ने तो वोट में जीतने पर भी नेताजी सुभाषचंद्र बोस से त्याग पत्र लिया, और सरदार पटेल के जीतने पर भी, पंडित जवाहरलाल को भारत का प्रधान मन्त्री बनाया | की जिस जवाहरलाल ने अपनी डायरी में खुद लिखा है, की रहन सहन में, व लिखने पढ़ने में मैं अंग्रेज हूँ, खानपान में मै मुसलमान हूँ,  दुर्भाग्य से मैं हिन्दू हूँ |

 

आज तक भारत वासियों ने इस पर चिन्तन व विचार नही किया की हम किन्हें पंडित कह रहे हैं ? इसका मूल कारण था इस मानसिकता वालों नें विदेश में पढ़कर आये थे, और नरेन्द्र भाई मोदी जी ने अपने ही देश में पढाई की है, भारत वासियों यह निर्णय तो आप लोगों को ही लेना है की विदेश में पढ़ने वालों को भारतीयता के बारे में पता होना है, अथवा भारत में पढ़े लोगों को भारतीयता के बारे में जानकारी होगी ?

 

मेरे पास इसके अनेक प्रमाण हैं, एक नमूना मैं दे रहा हूँ आप लोगों को, ऋषि अरविन्द जी के पिता डॉ कृष्ण धन घोष अपने पुत्र को अंग्रेज बनाना चाहरहे थे, मात्र 7 वर्ष की आयु में उन्हें लन्दन भेज दिया गया | वहां से पढ़ कर आने के वाद उन्हों ने अंग्रेजियत को तिलांजली दी, और भारतीयता को अपनाया तब उन्हें भारत में ऋषि कहकर पुकारा गया,बड़ी लम्बी कहानी है कभी लिख कर बताऊंगा आपलोगों को |

 

आज भी भारत में उन अंग्रेजों का बनाया पार्टी कांग्रेस को भारत का कोई चलाने वाला नही है यही विदेशी महिला ही इन तथा कथित अंरेजी मानसिकता वाले ही उनको श्रेय दे रहे हैं जो मूलरूपसे विदेशी मानसिकता वाले ही हैं | आज किसान आन्दोलन के नाम से सम्पूर्ण भारत को अस्थिर किया है  यही कांग्रेसियों ने |

 

भारतीयता को जो लोग जानते तक नही और मुखोटा भारत का पहने हैं जो नेहरु विचारों के हैं हिन्दू होना दुर्भाग्य माना और कहा है, यद्यपि हिन्दू नाम हमारा निजी नाम नही है, फिर भी वैदिक परम्परा को यही भारत के मूल निवासी ही तो मानते हैं ?

 

आज यही कांग्रेसी जन भारत को अस्थिर करने के लिए, की जिनको आज भारत वासियों ने नकार दिया है की यह विपक्ष में बैठने के काबिल भी नही हैं, जिसकी छठपटाहट ही आज सम्पूर्ण भारत में उधम मचाने में लगे हैं |

 

इन्ही कांग्रेस ने उन्हें सम्मानित किया, जो आज उन मिले सामान को वापस देने की बात कर रहे हैं, अरे अगर वापस देना है तो यह मिले सामान को वापस किस लिए दे रहे हैं ? वापस देना है तो उस आदर और सम्मान को भी लौटादो उस दिन जो आप लोगों को मिली थी |

 

अगर लौटाना है तो अपने साथीओं से पाकिस्तान से मिले सम्मान को लौटादें तब तो बात भारतीयता की हो सकती है वरना इस लावादा को त्याग दें, मुखौटा हो हटादें, भाईयों नकली भारतीय नेहरु जैसे दुर्भाग्य बताना छोड़दें तभी भारतीय कहलाने के अधिकारी बनेंगे जैसा परमात्मा दुनिया बनाने वाले के पास कोई भेद नही किया है ठीक उसी प्रकार बिना भेद भाव के ही मानवता की रक्षा की जा सकती है |

महेन्द्रपालआर्य = वैदिक प्रवक्ता = 30 /12 /20  =