जो अल्लाह पशु काटने को कहे वह दयालु कैसे ?

जो अल्लाह पशु काटने को कहे वह दयालु कैसे ?
ईद का मतलब ख़ुशी, इस्लाम मत के अनुसार यह साल में दो बार मनाई जाती है इन इस्लाम में साल में दो ख़ुशी मानाने का दिन है | अरबी महिना के अनुसार, रमजान के बाद जो महिना है जिसे शव्वाल का कहा जाता है | इस महीने की पहली तारीख को जो ईद मनाई जाती है उसे ईदुलफ़ित्र, इसकी विधी है नमाज पढने से पहले हर मुसलमान घर के जितने सदस्य होंगे उन सब के नाम से, पौने दो सेर गेहूं, या उसकी कीमत किसी मुसलमान गरीब जो आभाव ग्रस्त हो लाचारी में दिन बिताता हो उसे यह रकम देने का नाम फ़ित्र है |
 
यह समर्थ भी हर एक के पास न हो तो अपने परिवार के लोगों में एक दुसरे के हाथ से अंतिम सदस्य तक भिजवा कर उसे गरीब को बांटना होता है | नियम यह भी है की अगर यह फ़ित्रा न दिया गया हो तो उस के लिए ईद उलफ़ित्र की नमाज़ भी दुरस्त नहीं है |
 
किन्तु यह काम भी हर मुसलमान के लिए सम्भव नहं होता, फिर भी उसपर कोई ध्यान नहीं देता, की उसकी नमाज हो रही है या नहीं इसपर किसी से कोई चर्चा कभी नहीं सुन पाएंगे |
 
दूसरा ईद है ईदुज्जोहा, जो ईदुल फ़ित्र के दिनसे गिनकर दो महिना दसवां दिन में मानाई जाती है, इसी दिन क़ुरबानी की जाती है, और यह पारम्पर क्या है उसे, कल मैंने लिखकर बताया है | मूल रूप से अल्लाह ने अपने दोस्त इबराहीम खलील उल्लाह को {खलीलअर्थ दोस्त} ख्वाब दिखाया तुम्हारा प्यारा चीज को मेरे रास्ते में कुरबान करो |
 
मानव समाज के लिए समझने की बात यह है, की अल्लाह की धारना और सोच ही गलत है, कैसा देखें, की यह स्वप्न देखते ही इबराहीम ने तीन दिन दो,दो सौ, ऊंटों को जबह किया | यह अल्लाह को पसंद नहीं हुवा, जब की अल्लाह पहला दिन ही मना कर सकते थे तीन दिन खवाब दिखाने का क्या मतलब ? अल्लाह एक दिन में मना कर देते तो चार सौ ऊंटों की जान बच जाती | इसी लिए मुसलमानों को यह आदेश है की यह क़ुरबानी तीन दिन तक कर सकते है |
 
और यह इस्लाम वाले तब से लेकर अब तक करते आ रहे हैं, अल्लाह का हुक्म जान कर मान कर समझ कर | आज तक कोई भी मुसलमान यह सोचने और समझने को तैयार नहीं की इस पशु को काटने से अल्लाह की इबादत या अल्लाह की बताई गई नियम क्यों और कसी, इससे अल्लाह का क्या लेना देना है ? इससे यह बात स्पष्ट हो गया की जो लोग इसे अल्लाह का हुक्म मान कर जानवरों को काटते है उन्हें भी धर्म का कुछ भी अता पता नहीं और खा मा खा उसी अल्लाह को ईश्वर के साथ जोड़ कर या अल्लाह और ईश्वर एक है कहकर मानव समाज को गलत फहमी का शिकार बना रहे है | इसी एक बात से समझ जाना चाहिए की ईश्वर और अल्लाह दोनों में गुण अलग अलग है –
 
जब दोनों का गुण अलग अलग है इसके बाद भी दोनो को एक बतलाना मानव समाज के साथ धोका नहीं है ?
अब अल्लाह का खलील इब्राहिम को अल्लाह ने स्वप्न दिखाया तुम्हारा प्यारा चीज को कुर्बान करो | अब अल्लाह को कैसा पता की इबराहीम का प्यारा चीज बेटा इस्माईल है ?
 
कुरानी अल्लाह को ज्ञान ही नहीं है, कैसे देखें जिस इस्माईल को अल्लाह ने इबराहीम का प्यारा बताया जिसे इस्लाम वाले मानते हैं | यह नहीं सोचते इस बात को की अगर इब्राहीम का प्यारा इस्माईल होता तो उस दूध मुही बच्चे को घर से माँ बेटे को बाहर करते ?
 
बच्चा था या नहीं इस का प्रमाण मिलता है जब हज़रत इबराहीम माँ बेटे को छोड़े पानी तक नहीं दिया था, पानी की प्यास से माँ बेटे को सुलाकर सफा और मरवा दोनों पहाड़ों के बीच सात बार दौड़ लगाई अब बच्चा इस्माईल पैर पटक रहे थे, इसी जगह कुवां बन गया, जिसे आज भी हज करने वाले अनुकरण करते आ रहे हैं | की सात बार दोनों पहाड़ों के दौड़ लगाने के बाद, इसी कुएं से पानी निकाल कर पीते हैं घर भी लेकर आते हैं आदि |
 
अब इस्माईल जब नौ साल के हुए तो अल्लाह ने उसे जबह करने का हुक्म दिया, यहाँ अल्लाह को भी यह पता नहीं लगा की इस इस्माईल को कुरबानी देने से किसको यानि अल्लाह को या फिर इब्राहीम को लाभ मिल रहा है ? इससे कौन सा कल्याण किसका हो रहा है ? सोचने और समझने वाली बात यह है की यहाँ बताया जाता है की अल्लाह अपने दोस्त पैगम्बर.इब्राहीम का इम्तेहान ले रहे थे | जब के इम्तेहान लेना पड़ता है उनको जिनकी ज्ञान में कमी होती है, इससे यह भी बातें खुलगई की कुरानी अल्लाह ज्ञानी नहीं है ?
 
इसी अज्ञानता को मुसलमान कहलाने वाले आज तक मानते आ रहे हैं, इसी अज्ञानता रूपी बातों को वह धर्म जानकार, मना रहे हैं या क़ुरबानी करते आ रहे हैं | जबकि धर्म के साथ इसका कोई संपर्क और संवंध नहीं है यह धर्म का हिस्सा नहीं हो सकता है | निर्दोष पशुओं के गले में छूरी चलाने का आदेश दे तो वह अल्लाह ही है परमात्मा नहीं | कारण परमात्मा का स्वाभाविक गुण है जीवों पर दया करना इस्लाम का अल्लाह जीवों के गले में छुरी चलाने को धर्म बता दिया, जो सरासर गलत है |
 
यह है किस्सा इन कुरबानी का जिसे कल भी मनाया और आज भी मनारहे हैं भारत के लोग | मानव कहलाने वालों को जानना चाहिए धर्म क्या है क्या होना चाहिए किसे धर्म कहा जाता है किसी का प्राण लेना अगर धर्म है तो अधर्म किसे कहेंगे ? महेन्द्रपाल आर्य, 1/8/20