धर्म के साधना पक्ष को आगे और भी देखें |

|| धर्म के साधना पक्ष को और भी देखें ||

धर्म के साधना पक्ष ही एक ऐसा पक्ष है, जो मानव को मानव बनाता है, मानव को मानव बनने का बोध कराती है | मानव को हर बुराई से बचा कर धर्म के रास्ते पे चलने को प्रेरित करता है | मानव यही धर्म के साधना पक्ष को जीवनमे अमल कर ही साधक बनते हैं, मानव जीवन में निखार लाता है यही साधना पक्ष | हर मानव अगर इसी साधना पक्ष को अपने जीवन में उतार लेता है तभी मानव जीवन, कुन्दन बन जाता है, यही साधना पक्ष से मानव ईश्वर को जान सकता है | और परमात्मा का सानिध्य को प्राप्त करता है, साधन पक्ष के द्वारा ही मानव, ईश्वर, प्रकृति, और जीव, अर्थात अपने बारे में जान पाता है, मानव जीवन में निखार आता हैं | साधना पक्ष ही मानवों में चित्त की शुद्धि के लिए सहायक है, जैसा खेती करने वाले भी फसल को प्रयाप्त मात्र में पैदा करने के लिए खेत के पीछे मेहनत करते हैं, जमीन की तैयारी अच्छे तरीके से करते हैं | कारण खेती करने वालों को यह बात भली प्रकार मालूम हैं की अगर हमें फसल अच्छी लेनी है तो खेत के पीछे मेहनत करनी होगी |

ठीक इसी प्रकार प्रत्येक मनुष्यों को अपने जीवन को सफल से सफलतम की ओर लेजाने में  एक ही मात्र रास्ता है जीवन में साधना पक्ष को मजबूत बनाना, कारण मानव के जीवन रूपी फसल को अच्छा से अच्छा बनाने का यही एक मात्र तरीका है धर्म के साधना पक्ष को ठीक करना | जिसकी प्रधानता है जीवों पर दया करना इस साधना पक्ष में सबसे प्रथम वाक्य है, अथवा सबसे पहला कदम है |

हमारे ऋषि पातन्जल ने अपने योग दर्शन में सबसे पहला नम्बर में इसे ही रखा है, जिसे अहिन्सा कहा जाता है | धर्म के साधना पक्ष का सबसे पहला सोपान है हिंसा न करना, क्यों की हिंसा करने वाला कभी परमात्मा के सानिध्य लाभ नहीं कर सकता, जो मानव जीवनका एक मात्र लक्ष्य है | परमात्मा के गुणों को धारण करना ही मानव मात्र का कर्तव्य है, अगर मानव कहला कर परमात्मा के गुणों को प्राप्त नहीं करता अपने आचरण में नहीं लाता तो यह मानव परमात्मा के सन्तान भी नहीं कहला सकते |

अब यहाँ देखेंगे धर्म के नाम से जितने भी यह दुकानें चली है आज धरती पर, उसी परमात्मा के नाम से लोगों के अलग अलग मान्यताएं है | जैसा बाइबिल वालों ने परमात्मा का सन्तान सिर्फ ईशु को माना है, इधर इस्लाम वालों का कहना है अल्लाह का कोई सन्तान  नहीं, और ना अल्लाह किसी का सन्तान | अब यहाँ देखें परमात्मा में और अल्लाह में अन्तर हो गया वेद में परमात्मा को, माता,पिता, बन्धु, सखा कहा है | अनेक मन्त्र है वेद में, जैसा स नो बन्धुर्जनिता स विधाता धामानि वेद भुवनानि विश्वा |                          यत्र देवाsअमृतमानशानास्तृतिये धामन्नध्यैरयन्त || यजु =अ० ३२ /म० १०

अर्थ :-वह परमात्मा हमारा {बन्धु} भाई और सम्बन्धी के समान सहायक है सकल जगत का उत्पादक है वही सब कर्मों का पूर्ण करने वाला है | वह समस्त लोक लोकान्तरों को, स्थान स्थान को जानता है | यह वही परमात्मा है, जिसके आश्रय में योगीजन मोक्ष को प्राप्त करते हुए,मोक्षानंद का सेवन करते हुए उसके आनंद को प्राप्त करते हैं | अर्थात परब्रह्म परमात्मा के आश्रय से प्राप्त मोक्षानंद में स्वेच्छापूर्वक विचरण करते हैं | उसी परमात्मा की हम प्राप्ति करें |

उसी परमात्मा को सब प्रजाओं का स्वामी पालक, पोषक,रक्षक बताया है वेद में, सब प्रजाओं के स्वामी का अर्थ यही है पालने वाले को ही पिता काहा जाता है | किन्तु इस्लाम इसमें सहमत नहीं है, इस्लाम मी मान्यता है की अल्लाह किसीका पिता नहीं है | यहाँ अल्लाह में और ईश्वर में भी अन्तर हो गया | जब हम परमात्मा को नहीं जान सके तो उपासना किसकी करेंगे ?

इसका सठिक ज्ञान कहाँ से हो ? इसकी सम्पूर्ण जानकारी के लिए पूर्ण ज्ञानी के सानिध्य में ही प्राप्त किया जाना संभव है | अगर सही अर्थों में कोई सच्चा पथप्रदर्शक ना मिले तो मानव अपने जीवन के लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर सकता, अर्थात इस साधना पक्ष को सफल बनाने के लिए, एक पूर्ण ज्ञानी या गुरु की जरूरत है, या गुरु की अनिवार्यता है |

अगर सही पथ बताने वाले न हो तो मानव अपने जीवन में सफलता कोप्राप्त कैसे कर सकेगा ? हर के साथ सिष्य की पात्रता होने पर उपलब्धि निश्चित हो सकती है | कारण एक साधक जिनका जीवन प्रक्टिकल हो जो अपने जीवन को तपाये हों, जिन्हें इसकी उपलब्धि हुई हो वही दुसरे को दिशानिर्देश कर सकते हैं बता सकते हैं दूसरा कोई नहीं |

अब प्रश्न होता है की जब मानव का साधना पक्ष आत्मिक कल्याण है, अथवा आत्मा का सर्वांगींन विकास ही है, तो वहां किसी प्रकार का कोई भी क्लेश अमानवीयता मार काट, लुट राहजनी अथवा इस प्रकार की कोई भी बातों के लिए जगह कहाँ हो सकती है ? अब दुनियाँ में इस्लाम फैला है मार काट से, जिन्हें गुरु कहा गया जो मानवों को आत्मिक कल्याण के उपदेश जिनका मुख्य लक्ष्य था, उसे छोड़ लोगों को लुटने का हुक्म दे वह भी उसी आल्लाह के नाम से जिस अल्लाह को दुनिया का मालिक बताया जाता है उसी अल्लाह ने अपना उपदेश अपने नबी, रसूल, अथवा पैगम्बर को दे की तुम लूटकर लाव | फिर वह गुरु और वह उपदेश अल्लाह का क्यों और कैसे हो सकता है ? कुरान में अल्लाह ने क्या फरमाया | देखें यहाँ लड़ाई में जो महिलाएं कब्जे में आईं उनके लिए क्या कहना है अल्लाह का |

وَمَن لَّمْ يَسْتَطِعْ مِنكُمْ طَوْلًا أَن يَنكِحَ الْمُحْصَنَاتِ الْمُؤْمِنَاتِ فَمِن مَّا مَلَكَتْ أَيْمَانُكُم مِّن فَتَيَاتِكُمُ الْمُؤْمِنَاتِ ۚ وَاللَّهُ أَعْلَمُ بِإِيمَانِكُم ۚ بَعْضُكُم مِّن بَعْضٍ ۚ فَانكِحُوهُنَّ بِإِذْنِ أَهْلِهِنَّ وَآتُوهُنَّ أُجُورَهُنَّ بِالْمَعْرُوفِ مُحْصَنَاتٍ غَيْرَ مُسَافِحَاتٍ وَلَا مُتَّخِذَاتِ أَخْدَانٍ ۚ فَإِذَا أُحْصِنَّ فَإِنْ أَتَيْنَ بِفَاحِشَةٍ فَعَلَيْهِنَّ نِصْفُ مَا عَلَى الْمُحْصَنَاتِ مِنَ الْعَذَابِ ۚ ذَٰلِكَ لِمَنْ خَشِيَ الْعَنَتَ مِنكُمْ ۚ وَأَن تَصْبِرُوا خَيْرٌ لَّكُمْ ۗ وَاللَّهُ غَفُورٌ رَّحِيمٌ [٤:٢٥]

और तुममें से जो शख्स आज़ाद इफ्फ़तदार औरतों से निकाह करने की माली हैसियत से क़ुदरत न रखता हो तो वह तुम्हारी उन मोमिना लौन्डियों से जो तुम्हारे कब्ज़े में हैं निकाह कर सकता है और ख़ुदा तुम्हारे ईमान से ख़ूब वाक़िफ़ है (ईमान की हैसियत से तो) तुममें एक दूसरे का हमजिन्स है पस (बे ताम्मुल) उनके मालिकों की इजाज़त से लौन्डियों से निकाह करो और उनका मेहर हुस्ने सुलूक से दे दो मगर उन्हीं (लौन्डियो) से निकाह करो जो इफ्फ़त के साथ तुम्हारी पाबन्द रहें न तो खुले आम ज़िना करना चाहें और न चोरी छिपे से आशनाई फिर जब तुम्हारी पाबन्द हो चुकी उसके बाद कोई बदकारी करे तो जो सज़ा आज़ाद बीवियों को दी जाती है उसकी आधी (सज़ा) लौन्डियों को दी जाएगी (और लौन्डियों) से निकाह कर भी सकता है तो वह शख्स जिसको ज़िना में मुब्तिला हो जाने का ख़ौफ़ हो और सब्र करे तो तुम्हारे हक़ में ज्यादा बेहतर है और ख़ुदा बख्शने वाला मेहरबान है |

क्या यही क्लामुल्लाह है यही धर्म है इसे धर्म कहा जायेगा ? यही साधना और आध्यातम कहेंगे अथवा इन्हें गुरु कहेंगे ? सच्चा ज्ञानी इसी ही कहा है इस्लाम में | और यह उपदेश जहाँ है उसे सत्यज्ञान की किताब माना है लोगों नें | विचार करें =फिर कल

महेन्द्रपाल आर्य =9 /7 /18 =