धर्म सिर्फ और सिर्फ मानवों के लिए ही है |

|| धर्म सिर्फ और सिर्फ मानव के लिए ही है ||

 

जिस धर्म की चर्चा हम कर रहे हैं, उसका सारा सम्बन्ध मानवीय चेतना से है, यदि थोड़े शब्दों में इसकी परिभाषा दी जाय तो, ”जिस किसी क्रिया अथवा विधि से मानवीय चेतना का विकास हो सके वही धर्म है | धर्म का मुख्य उद्देश्य मनुष्य की अध्यात्मिक उन्नति है, जिसके लिए धर्म का जन्म हुआ|

धर्म वही है जो अपने नियम एवं आचरण से ऐसी व्यवस्था बिठाता है जिसमें चेतन निरन्तर विकास करती जाती है और अन्तमें ईश्वर से आनन्द को प्राप्त करना जो मानव जीवनका उद्देश्य है उसे प्राप्त करलेता है |

 

धर्म केवल अवधारणा या परिकल्पना मात्र नहीं है, बल्कि मानव की उत्कृष्ट दृष्टि है, या शाश्वत जीवन मूल्यों की खोज है | इस धर्म के आचरण से मानव अपनी उन्नति के शिखर तक पहुंचता है इससे केवल श्रेष्ठ जीवन ही नहीं मिलता बल्कि उच्चतर जीवन की प्राप्ति होती है |

 

धर्म समाधि में नहीं व्यबहार में प्रकट होना चाहिए, धर्म सामाजिक सामंजस्य का साधन है धर्म पर आचरण करने वाला मानव की अपनी पहचान होती है जो बाहरी आडंबर या दिखावा से अलग है | गले में कंठी माला, या हाथ छुपाकर अन्दर माला फेरने का नाम धर्म नहीं है, और ना बाहर हाथ में तस्बीह घुमाने का नाम धर्म है | धर्म आत्मा का विषय है आचरण करने का विषय है जिसमें बाहरी दिखावा नाम की लेश मात्र भी जगह नहीं है |

 

मन्दिर, मस्जिद, गिर्जा, गुरुद्वारा, घुमने का अथवा अमरनाथ यात्रा हो या फिर मक्का मदीना का या बैतूल मुक़द्दस का परिक्रमा करने का नाम धर्म नहीं है | धर्म स्वयं की सुप्त अध्यात्मिक शक्ति को उजागर, व्यक्ति को श्रेष्ठता प्रदानं करने वाली विद्या का नाम धर्म है | धर्म मानवों को दु:खों से मुक्ति दिला कर आनन्द की अनुभूति कराता है, धर्म ही एक मात्र साधन है जो मनुष्य को मनुष्य बना कर दुनिया के बनाने वाले का सानिध्य को प्राप्त कराता है | धर्म ही है जो मनुष्य को पशु का भेद बताता है देवत्व को प्राप्त कराता है |

 

सत्य एक ही है धर्म पर आचरण करते हुए ही उसी धर्म का पाया जाना संभव है, धर्म का एक ही मात्र उद्देश्य है सत्य को उपलब्ध होना | सत्यांनास्ति परो धर्म:{ सत्य से परे कोई धर्म नहीं है }

धर्म का सम्वन्ध सत्य से है, योगदर्शन का दूसरा अंग है सत्य “ अर्थात सत्य को नहीं जानने वाला, सत्य पर ना चलने वाला धार्मिक नहीं हो सकता सत्य आचरण ही मनुष्य को मनुष्य बनता है |

 

व्यक्ति की पूजा से कोई मनुष्य धर्मिक नहीं हो जाता अथवा धर्मिक नहीं बन सकता, वेद में सर्वथा निषेध है, व्यक्ति पूजा की कोई स्थान वेद में नहीं है विशुद्ध एकेश्वरवाद ही धर्म है |

 

धर्म जीवनका आदि एवं अन्तिम सत्य है, धर्म मानवीय गुणों के विकास का नाम है, धर्म का अन्य कोई प्रयोजन नहीं है धर्म इतना सस्ता भी नहीं जी सड़क चलेते मन्दिर, मस्जिद, गिरजा, गुरुद्वारा के सामने माथा या सर झुकाने से प्राप्त ही जाय |  धर्म वह नहीं जो 10 दिन,अथवा महिना भर उपवास करने से प्राप्त हो जाय ? मन्दिर जा कर तिलक लगा लेना धर्म नहीं है, ना ही मस्जिद में जाना धर्म है, स्वयं की चेतना को उच्च स्तर तक पहुंचाना ही धर्म है |

 

धर्म को जान कर पहचानकर उसके अनुसार आचरण करने का नाम धर्म है. आत्मा के स्वाभाव विपरीत जाना ही अधर्म है, जिससे मनुष्य की दुर्गति होती है | धर्म के माध्यम से मनुष्य में दिव्य गुणों का विकास होता है | धर्म मानव को मानव से जोड़ता है, मत पंथ मजहब मनुष्य को मनुष्य से अलग करता है, मानव समाज में मत भेद पैदा करता है | मजहब की मान्यता एक दुसरे से मेल नहीं खाता सब की अलग अलग है |

 

धर्म वही है जो एक दुसरे से मतभेद या मनभेद ना हो, धर्म एक है, और मजहब अनेक है, जहाँ धर्म  अनेक होंगे तो एक दुसरे से मतभेद होना रखना स्वाभाविक होगा | यही कारण है सब अपने को श्रेष्ठ बतलाते हैं एक दुसरे का विरोध करते हैं | ईसाई कहते हैं हमारा धर्म अच्छा है सत्य है, इस्लाम कहता है हमारा ही सत्य है जैसा कुरान में अल्लाहने भी कहा | सूरा इमरान के आयत= 19 और 85 को देखें |   إِنَّ الدِّينَ عِندَ اللَّهِ الْإِسْلَامُ  | निस्संदेह अल्लाह का दीन, इस्लाम है |

وَمَن يَبْتَغِ غَيْرَ الْإِسْلَامِ دِينًا فَلَن يُقْبَلَ مِنْهُ وَهُوَ فِي الْآخِرَةِ مِنَ الْخَاسِرِينَ [٣:٨٥]

और हम तो उसी (यकता ख़ुदा) के फ़रमाबरदार हैं और जो शख्स इस्लाम के सिवा किसी और दीन की ख्वाहिश करे तो उसका वह दीन हरगिज़ कुबूल ही न किया जाएगा और वह आख़िरत में सख्त घाटे में रहेगा |

 

नोट :- कुरान में अल्लाह ने कहा एक ही दीन {धर्म }है जिसका नाम इस्लाम है | अब ईसाई इसे किसलिए सत्य मानेंगे ? जैनी, और बौधिध्ष्ट, सिख,इसे किसलिए सत्य समझेंगे ?

फिर कहा जाता है कुरान और बाइबिल यह भी अल्लाह की दी हुई किताब है | जब अल्लाह एक है तो उसकी बनाई हुई धर्म ईसाई, और इस्लाम दो होना क्यों और कैसा सम्भव होगा ? अथवा उसकी दी हुई किताब जब दो होंगे, अथवा चार होंगे तो, एक किताब दुसरे से अलग होना जरूरी होगा | वरना एक से अधिक होना संभव नहीं | अगर कोई कहें की अल्लाह की हुक्म नहीं मानने से, अल्लाह ने बदल दिया | तो क्या अल्लाह को यह जानकारी थी की हमें अपना धर्म बदलना पड़ेगा, यह अपनी किताब भी बदलनी पड़ेगी ? फिर अल्लाह का ज्ञान पूर्ण होगा अथवा अपूर्ण ?               अल्लाह सवालों के घेरेमें |  फिर कल =                       महेन्द्रपाल आर्य =29/6/18 =