नमाजे वित्र में अल्लाह से क्या कहते मुस्लिम ?

|| नमाज़े वित्र में अल्लाह से क्या कहते मुस्लिम ||

यह अरबी में लिखा है, कोई उर्दू न समझ बैठे, कुछ न समझ अपढ़ लोग हैं जो उर्दू को अरबी सकम्झने लगते हैं | यह जिहालत है जब की उर्दू भारतीय भाषा है यह बातें बहुत से हिन्दू कहलाने वालों को पता ही नहीं और इसी उर्दू को अरबी समझने लगते हैं |

रोजाना 5 वक्ती की नमाज़ में रात्रि में एक नमाज़ है जिसे नमाजे ईशा कहा जाता है,और यह दिन भर की अन्तिम नमाज है, यह नमाज़ कुल 17 रकयात की है, इसी नमाज़ में वाजिब नमाज़ के नाम 3 रकयात की है यह मिलकर 17 रकयात होती है | वाजिब उसे कहते है जो जरूरी है कर्तव्य, जैसा फ़र्ज़, फ़र्ज़ उसे कहते हैं जो अल्लाह का हुक्म है, सुन्नत उसे कहते हैं, जो हज़रत मुहम्मद ने किया,या उनका आदेश, नफल उसे कहते हैं जो सिर्फ अपने लिए होता है, वाजिब उसे कहते हैं, जो उपर लिखा है | तो इसी वाजिब नमाज में 3 रकयात के अन्तिम में यह दुवा पढ़ी जाती है | यह बात भी याद रहे की यह दुवा कुरान का हिस्सा या भाग नहीं है |

यहाँ मैं एक प्रशन करना चाहता हूँ सम्पूर्ण इस्लाम वालों से, एक तरफ तो कुरान में अल्लाह ने फरमाया कुरान का नकल तुम नहीं बना सकते हो,अर्थात यह अल्लाह का कहना है की अगर कुरान को झुटलाते हो तो कुरान का मसल {बराबर } आयात ले आवो, पर मैं कह्देता हूँ की तुम नहीं ला सकते |

अब सवाल पैदा होता है की यह कुरान जैसी दुवा किसने बनाई ? जो दुवा कुनुत नीचे, लिखा हूँ यहाँ ठीक कुरानी आयातों जैसी ही है इसका बनाने वाला कौन है ?

नमाज में कुरान से बाहर की चीजें कई है उनसब का बनाने वाला कौन है जो अरबी ही है और कुरान में भी नहीं है कुरान जैसा ही सुनने में लगता है इनसब को किसने बनाया ?

اَللّٰهُمَّ اِنَّا نَسْتَعِيْنُکَ وَنَسْتَغْفِرُکَ وَنُومِنُ بِکَ وَنَتَوَکَّلُ عَلَيْکَ وَنُثْنِی عَلَيْکَ الْخَيْرَ وَنَشْکُرُکَ وَلَانَکْفُرُکَ وَنَخْلَعُ وَنَتْرُکُ مَنْ يَّفْجُرُک اَللّٰهُمَّ اِياکَ نَعْبُدُ وَلَکَ نُصَلِّی وَنَسْجُدُ وَاِلَيْکَ نَسْعٰی وَنَحْفِدُ وَنَرْجُوْا رَحْمَتَکَ وَنَخْشٰی عَذَابَکَ اِنَّ عَذَابَکَ بِالْکُفَّارِ مُلْحِقٌ۔

अर्थ :- ऐ अल्लाह हम तुझसे माफ़ी मांगते है और तुझपर ईमान लाते हैं और तुझपर भरोसा रखते हैं,और तेरी बहुत अच्छी तारीफ करते हैं, और तेरा शुक्र करते हैं और तेरी ना शुक्री नहीं करते और अलग करते हैं और छोड़ते हैं उस शख्स को जो तेरी ना फ़रमानी करे | ऐ अल्लाह हम तेरी ही इबादत करते हैं, और तेरे लिए ही नमाज़ पढ़ते है, और सजदा करते हैं, और तेरे ही तरफ दौड़ते और हाज़िर होते हैं खिदमत के लिए, और तेरी रहमत के उमीदवार हैं          और तेरी अजाब से डरते हैं, बेशक तेरा अजाब काफिरों को मिलने वाला है |

नोट :- काफिरों को अजाब देने वाला अल्लाह है, तो क्या यह बात अल्लाह को याद नहीं, की काफिरों को सज़ा मिलेगा या नहीं ? दिनभर हर नमाजी नमाजे वित्र में अल्लाह को याद  दिलाते हैं ? अथवा यह बातें अल्लाह को याद दिलाई जा रही है ? बात यह है की दुनिया का हर मुस्लमान अल्लाह से यही कह रहे हैं की ऐ अल्लाह काफिरों को अजाब देने में भूल ना जाना ? बेशक तेरा अजाब काफिरों को मिलने वाला है | मतलब यह भी निकला की काफिरों को छोड़ ईमान दारों को अजाब मिलने वाला ही नहीं है ?

दुनिया के लोग इस्लामी अल्लाह, और उस अल्लाह के बन्दों की मानव समाज में किसप्रकार की ना इंसाफी और मानव समाज में बैर भाव किया है इसपर चिन्तन और विचार करें |

धन्यवाद के साथ =महेन्द्रपाल आर्य =राष्ट्रिय प्रवक्ता राजार्य सभा = 6 /8 /18 =