पत्नी दुसरे मर्द के पास रात गुजारे यह हुक्मे खुदा क्यों है ?

पत्नी किसी मर्द से रात गुजारे यह हुक्म अल्लाह का किसलिए ?

कल रात न्यूज़ इण्डिया 18 में हमतो पूछेंगे, वाला कार्यक्रम से पताचला उ प, के बरेली में एक मुस्लिम ने अपने पत्नी को तीन तलाक देने के बाद, घर परिवार से लेकर दूरदर्शन तक बात पहुँची | उसमें यह भी बताया गया की बहुकी ससुर ने कहा मेरे लड़के ने तीन तलाक दिया है, अगर यह बहु चाहती है मेरे घर रहे तो एक रास्ता है ही मुझसे यह हलाला करे { यह मुझ से निकाह करे और मेरे साथ रात गुजारे, फिर मैं तलाक दे दूंगा जब फिरसे मेरे लड़के से इसकी शादी हो जाय गी |

अब सवाल पैदा होता है की यह प्रथा है किसका कौन लोग इस प्रथा को मानते हैं, सीधा सा जवाब होगा इसलाम की प्रथा है इस्लाम वाले ही मनाते हैं |

कल के उस कार्यक्रम में मौलाना अब्दुर रहीम ने कहा इसलाम में हलाला नहीं है, मौलाना नईमुद्दीन ने कहा हमारे हुजुर ने कहा जो इस प्रकार से हलाला करे उनपर लायनत है |

अब सवाल पैदा होता है की आखिर यह हलाला शब्द ही जब इस्लाम का है, यह तिरी रिवाज़ इस्लाम वालों का है फिर यह कहना कहाँ तक सही होगा, की हलाला इस्लाम का नहीं करने वालों पर लायनत है आदि ?

सुमित अवस्थी जी यह नहीं पूछा की आखिर यह है किनका कहाँ से आया है इसे मानते कौन लोग हैं क्या मानव समाज में एक इस्लाम को छोड़ यह प्रथा किसी और समाज में है?

यहाँ एक बात और भी है जिसपर किसी ने चर्चा नहीं की और न यह सवाल इस्लाम वालों से किसी ने पूछा ? की अगर तीन तलाक देने में गलती पुरुष की हो, और उस पत्नी को किसी और मर्द से रात गुजारने पड़े उस महिला से शारीरिक सम्वन्ध दूसरा मर्द बनाये तो महिला को यह सजा क्यों और किसलिए ?

इसे लोग बेशर्मी भी नहीं समझते और ना मानते हैं बेइज्जती इसे धर्म का हिस्सा मानते हैं फरमाने हक़ मानते हैं, हुक्मे इलाही मानते है | ना जाने इससे अल्लाह को क्या फायदा मिल रहा है जो अल्लाह ने अपनी कलाम में यह आदेश दिया है नीचे प्रमाण प्रस्तुत है देखें |

 

न्यूज़ चेनल में देखा और सुना मुस्लिम पर्सोनल ला बोर्ड के अधिकारियों ने सुप्रीमकोर्ट को लिख कर दिया, निकाह नामा में तलाक ना देने को लिखा जायगा और काजी को भी बतादिया जायगा |

अब सवाल यह है की यह तीन तलाक है क्या, यह आदेश किनका है कहाँ से है यह जानना जरूरी है | अगर यह तीन तलाक देने का नियम अल्लाह का है {कुरानी} है, तो यह अधिकार मुस्लिमपर्सोनल ला बोर्ड को उसे ना देने का अथवा मना करने का अधिकार कहाँ से होगा ? क्या यह मुस्लिम पर्सोनल ला बोर्ड कुरानी हुक्म {आदेश} को कुरान से हटाने को स्वीकार रहे हैं ? जब यह आदेश कुरान का है मुस्लमान अपने पत्नी को तीन तलाक दे सकता है | तो क्या अल्लाह के दिए गये हुक्म, या आदेश को हटाने का फरमान मुस्लिम पर्सोनल ला बोर्ड को क्यों और किसे ?

الطَّلَاقُ مَرَّتَانِ ۖ فَإِمْسَاكٌ بِمَعْرُوفٍ أَوْ تَسْرِيحٌ بِإِحْسَانٍ ۗ وَلَا يَحِلُّ لَكُمْ أَن تَأْخُذُوا مِمَّا آتَيْتُمُوهُنَّ شَيْئًا إِلَّا أَن يَخَافَا أَلَّا يُقِيمَا حُدُودَ اللَّهِ ۖ فَإِنْ خِفْتُمْ أَلَّا يُقِيمَا حُدُودَ اللَّهِ فَلَا جُنَاحَ عَلَيْهِمَا فِيمَا افْتَدَتْ بِهِ ۗ تِلْكَ حُدُودُ اللَّهِ فَلَا تَعْتَدُوهَا ۚ وَمَن يَتَعَدَّ حُدُودَ اللَّهِ فَأُولَٰئِكَ هُمُ الظَّالِمُونَ [٢:٢٢٩]

तलाक़ रजअई जिसके बाद रुजू हो सकती है दो ही मरतबा है उसके बाद या तो शरीयत के मवाफिक़ रोक ही लेना चाहिए या हुस्न सुलूक से (तीसरी दफ़ा) बिल्कुल रूख़सत और तुम को ये जायज़ नहीं कि जो कुछ तुम उन्हें दे चुके हो उस में से फिर कुछ वापस लो मगर जब दोनों को इसका ख़ौफ़ हो कि ख़ुदा ने जो हदें मुक़र्रर कर दी हैं उन को दोनो मिया बीवी क़ायम न रख सकेंगे फिर अगर तुम्हे (ऐ मुसलमानो) ये ख़ौफ़ हो कि यह दोनो ख़ुदा की मुकर्रर की हुई हदो पर क़ायम न रहेंगे तो अगर औरत मर्द को कुछ देकर अपना पीछा छुड़ाए (खुला कराए) तो इसमें उन दोनों पर कुछ गुनाह नहीं है ये ख़ुदा की मुक़र्रर की हुई हदें हैं बस उन से आगे न बढ़ो और जो ख़ुदा की मुक़र्रर की हुईहदों से आगे बढ़ते हैं वह ही लोग तो ज़ालिम हैं |

فَإِن طَلَّقَهَا فَلَا تَحِلُّ لَهُ مِن بَعْدُ حَتَّىٰ تَنكِحَ زَوْجًا غَيْرَهُ ۗ فَإِن طَلَّقَهَا فَلَا جُنَاحَ عَلَيْهِمَا أَن يَتَرَاجَعَا إِن ظَنَّا أَن يُقِيمَا حُدُودَ اللَّهِ ۗ وَتِلْكَ حُدُودُ اللَّهِ يُبَيِّنُهَا لِقَوْمٍ يَعْلَمُونَ [٢:٢٣٠]

फिर अगर तीसरी बार भी औरत को तलाक़ (बाइन) दे तो उसके बाद जब तक दूसरे मर्द से निकाह न कर ले उस के लिए हलाल नही हाँ अगर दूसरा शौहर निकाह के बाद उसको तलाक़ दे दे तब अलबत्ता उन मिया बीबी पर बाहम मेल कर लेने में कुछ गुनाह नहीं है अगर उन दोनों को यह ग़ुमान हो कि ख़ुदा हदों को क़ायम रख सकेंगें और ये ख़ुदा की (मुक़र्रर की हुई) हदें हैं जो समझदार लोगों के वास्ते साफ साफ बयान करता है |

 

नोट:-यहाँ कुरान में अल्लाह ने स्पस्ट बताया की यह अल्लाह की मुक़र्रर की हुई हदें है इसे पार ना करो फिर जालिमों में गिनती होगी | आयात =230 बकर में क्या कहा अल्लाह ने फिर अगर तीसरी बार भी औरत को तलाक़ (बाइन) दे तो |

मेरा सवाल यहाँ है की अल्लाह का फरमान है, फिर अगर तीसरी बार भी औरत को तलाक दे दो, उसे किसी और मर्द से शादी किये बिना अपने लिए जायज नही है, वह भी दूसरा मर्द जब उसे तलाक दे तो पहला पति उसे फिर से निकाह करे | यह है अल्लाह का हुक्म, अब किसी मुस्लिम पति पत्नी में अनबन हो और वह तलाक ना दे सके तो वह क्या करे ? यह बात भी मुस्लिम पर्सोनल ला बोर्ड को बताना पड़ेगा ?

पहली बात तो यह है जब तीन तलाक देने का हुक्म अल्लाह का है कुरान का है, इस आयात का ना मानने पे वह मुस्लमान क्यों और कैसा रहेगा ? और आयात कुरान से हटाना भी पड़ेगा, कारण जब उसे नही मानेंगे तो उसमें{कुरान}में रहने का क्या मतलब ? अब यहाँ कुरान 6,6,66, आयातों का ना रहकर 6,6, 65, को रह जायगा | जब की अल्लाह के मुताबिक एक नुक्ता भी उसमें से हटाया जाना संभव नही है,फिर इस्लाम का क्या होगा ?

 

क्या इस्लाम वाले ही इस्लाम को अलविदा कहेंगे, अथवा इसलाम वाले बन कर रहेंगे, अथवा रहना संभव होगा ? जब आप ने कुरानी आयात को छोड़ा फिर इस्लाम वाले कहाँ रहेंगे ?

आज इस्लाम वालों को गंभीरता से विचार करना ही चाहिए, की इस्लाम के अथवा कुरानी अल्लाह का यह हुक्म तीन तलाक को जब हम अमानवीय जान कर मानने लगेंगे,फिर उन अल्लाह का क्या होगा  जिस अल्लाह ने कुरान में तीन तलाक और हलाला का आदेश दिया है, जो कुरान में मौजुद है, उसे अगर मुस्लिम पर्सोनल ला बोर्ड को हटाना ही पड़े अथवा तीन तलाक देने पर मनाही स्वीकार करना पड़े तो फिर वह इस्लामी कानून और इसलाम धर्म का विषय कहाँ रह गया ?

 

यहाँ कपिलसिब्ब्ल मुस्लिम शरीयती कानून बोर्ड के वकील की भी धज्जियाँ उड़ी, जिन्हों ने कहा था यह मुसलमानों का आस्था और धर्म का विषय है | आज उन्ही मुस्लिम पर्सोनल ला बोर्ड को तीन तलाक ना देने की हिदायत निकाहनामा में और काजियों के लिए भी इस पर हिदायत किस लिए दी जाने की बात को स्वीकारा ? कहाँ गया शरीयत, कहाँ गया मुसलमानों के शरीयती कानून ? कहाँ गई आस्था, कहाँ गया धर्म ?

 

महेन्द्रपाल आर्य तो आज से 35 वर्ष पहले ही इसलाम को अलविदा कह दिया है, अब अहिस्ता अहिस्ता प्रायः इसलाम के नुमाइन्दा मुसलिम कानून के मानने वालों को भी इन कुरानी कानून व्यवस्ता को हटाने का मतलब इस्लाम को हो अस्वीकार करना ही है |

इसलिए आर्यसमाज के प्रवर्तक ऋषि दयानंद को भी लिखना पड़ा सत्यको ग्रहण करने और असत्य को छोड़ने में सर्वदा उद्दत रहना चाहिए | हम सबको चाहिए की मानव होने हेतु सत्य को अपनाएँ और असत्य त्याग कर हम मानव कहलाने वाले बनें | छोड़ें उन मजहब, मत और पन्थ को धर्म को जानें मजहबी ना बन कर हम ध्रार्मिक बनें | धन्यवाद के साथ महेंद्रपाल आर्य =वैदिकप्रवक्ता=10 /2 /18