मानव मात्र का एक ही मानव जाति

|| मनुष्यमात्र का एक ही मानव जाती ||
परमपिता परमात्मा ने अपनी सृष्टि में मानव नाम का एक प्राणी बनाया, जिसमें धरती के सभी मानव है | अन्य जितने भी प्राणी हैं सब के अलग अलग नाम है, जिव जन्तु कीट पतंग, और पेड़ पौधे जितने भी हैं, यहाँ तक की घांस भी जितने हैं सब का नाम अलग अलग ही है | फुल पत्तियां प्रकृति की सजावट में परमात्मा की सृष्टि में जितने भी हैं सब के नाम अलग अलग ही है |
अलग अलग रंग के होंगे फिर भी उसका नाम एक ही है जैसे गुलाब के फुल | अनेक रंग के मिलेंगे किन्तु नाम गुलाब है | ठीक इसी प्रकार मनुष्यों के रंग अलग अलग ही होतेहैं किन्तु नाम मनुष्य ही है | हर एक मुल्क के मनुष्यों के रंग में भेद तो है फिर भी नाम मनुष्य ही है | मनुष्यों को किसी अन्य नामों से पुकारा नहीं जाता चाहे वह भारत का हो, चीन, या जापान का हो, लन्दन अमेरिका का गोरा हो या फिर अफ्रीका का काला, जब सब का नाम मनुष्य है फिर उन मनुष्यों में जाति अलग अलग क्यों और कैसे हुवा ? यही तो कारण बना मानव मात्र का एक ही जाति मानव जाति | कहाँ कहा गया ब्राह्मण मनुष्य में एक जाति है ? यह है वर्ण और मनुष्य में वर्ण होते हैं चार | चतुर्वर्ण मयासिस्टम गुणकर्म विभागसौ |
यह विभाग बताया गया, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, और शुद्र =यह कर्मानुसार है नाम, जिस काम को जो करेगा उसी नाम से उसे पुकारा जायगा | यह जन्म से कहाँ है जन्म से तो हर कोई शुद्र है, जन्मना जायते शुद्रा: = शुद्र का अर्थ है अनजान जो नहीं जानता, दुनिया में उसे जानकारी दी जाती है |
ठीक इसी प्रकार,मानव के जन्म से ही मानव मात्र का एक ही धर्म है धर्म अलग अलग नहीं होता | परमात्मा के बनाये सामान सब के लिए बराबर है सूरज चद्रमा आकाश वायु नदी नाला सागर पर्वत यह सभी ईश्वर प्रदत्त जितने भी हैं मनुष्य मात्र के लिए है किसी के चाहने पर भी एक दुसरे को परमात्मा के बनाये हुए सामानों से वंचित नहीं कर सकता | जैसा सूरज से आकाश से वायु से एक दुसरे को वंचित नहीं कर सकता |
ठीक धर्म भी परमात्मा के द्वारा ही बना एक ही है जिसका नाम मानव धर्म है | बाकि धरती पर जितने भी हैं वह सभी मत हैं जो किसी व्यक्ति के द्वारा बनाया गया है, जिसे गौतम बुद्ध ने बनाया वह धर्म नहीं है | जब तक गौतम बुद्ध का जन्म नहीं हुवा था तो धरती पर कौन बौद्ध धर्मी था | गौतम बुद्ध ने मनुष्यों को धर्म से हटा कर अपने मत में शामिल किया जिसे मायावती धर्म कह रही हैं | यह मात्र अन्याय ही नहीं है यह मानव समाज के साथ धोखा हो रहा है | मानव समज को रास्ता दिखाने के बजाए मानव समाज को अन्धकार में धकेला जा रहा है |
शंकराचार्य ने इस पर सख्ती से पेश आये तो भारत से बुद्ध की दुकानदारी बंद हो गयी थी अब आंबेडकर ने इसे बढ़ावा दिया | हमारे समाज में विशेष कर हिंदुयों को बाँटने की एक साजिश है, यह हिन्दू कहलाने ही हिन्दू को गाली दे रहा है | आये दिन दूरदर्शन के माध्यम से देख और सुन रहे हैं | सत्य सनातन वैदिक धर्म पर आर्य संस्कृति पर कुठाराघात हो रहा है इन बुधिष्टों के द्वारा ही | आज इस सत्यता को जानने की जरूरत है मानव समाज को सत्य बताने की जरूरत है मिडिया के माध्यम से यह काम हो सकता है किन्तु यह मिडिया वाले ही सत्य से विमुख है सत्य को वह भी जानना नहीं चाहते, ना औरों को सत्य सेपरिचय कराना चाहते हैं | हमें आज ही प्रतिज्ञा लेनी होगी सत्य को औरों तक पहुँचाने की, हर कोई मानव कहलाने वाले अपना दायित्व निभाने का प्रयास करें मानव मात्र का कल्याण होगा |
धन्यवाद के साथ महेन्द्रपाल आर्य =26 x 17