मुंबई में व गुजरात में वैदिक प्रचार जोरों पर

यह कार्य मेरे परम मित्र श्री भाई मगनलाल जी दीवानी द्वारा हो रहा है नये नये भीमआर्मी से लेकर वैदिक धर्म में दीक्षा दुसरे मत पंथ वालों को वैदिम धर्मी बनाने का काम बिना थके भाई मगनलाल जी कर रहे हैं |
 
अभी एक बड़ी टीम को गुजरात में उन्हों ने नये नये लोगों को ऋषि कृत सत्यार्थ प्रकाश वितरण किया है | मुंबई में भी इसी प्रकार का कार्य आप का निरंतर जारी रहता है | इसमें एक दो बच्चे ऐसे भी हैं जो महेद्रपाल आर्य जैसा ही कुरान पढ़कर सुनाते हैं = अशुद्ध नहीं बिलकुल शुद्ध रूपसे मुझे सुन सुन कर मेरे व्याखान को रटा है | यह सभी श्र्येय भी भाई मगनलाल जी को ही जाता है |
 
महर्षि दयानंद जी ने आर्य समाज की स्थापना १८७५ में गिरगांव मोहल्ला में डॉ ० मानिक राव के घर की थी | उस समय से निरंतर आर्य समाज का प्रचार मुंबई शहर के विभिन्न इलाके में आर्य समाज मन्दिर बनाकर लोग अधिकारी बनकर आर्य समाज में कहीं विद्यालय – कहीं औषधालय – और कहीं बिवाह का कार्य क्रम चलाया रहे है |
 
ऋषि दयानंद जी का जो उद्देश्य था मानव समाज को वेद और वैदिक मान्यता के साथ जोड़ना | घर घर वेद को पहुंचाना मानव समाज को वैदिक मान्यतानुसार =ईश्वर =वेद = और वैदिक धर्म के साथ जोड़ना = राष्ट्र और राष्ट्रीयता को कूट कूट कर भारत वासियों में भरना |
 
आज आर्य समाज से ऋषि का मंतव्य लुप्त ना होने पाय इसी मंशा और उद्देश्य को लेकर मेरे परम मित्र और सहयोगी ऋषि दयानंद जी के अनन्य भक्त दर्शन शास्त्र को अपने जीवन में अक्षर स: उतारने का प्रयास करने वाले भाई श्री मगनलाल दीवानी जी तन मन धन तीनों को सपर्पित करते हुए महाराष्ट्र और गुजरात दोनों ऋषि के जन्मस्थली और कर्मस्थली = इन दोनों जगहों में ऋषि कृत ग्रथों के प्रचार प्रसार में लगे हुए हैं |
 
हमारे भाई जी ने लिखा है विद्यालय और औषधालय से लोगों को लाभ ही होगा ? जी बिलकुल होगा – आप के मुंबई महानगरी में हुवा भी है -आप को कहते कहते जिस काकड़ वाडी आर्य समाज का सदस्य बनवाया – उसी समाज में ही हुवा है = विद्यालय खोला था जिस जगह पर, वह आर्य समाज के हाथ से निकली लाभ हुवा या नुकसान ?
 
यह मात्र एक आर्य समाज में नहीं भारत हो या अन्य देशों में हो सभी आर्य समाजों में यही हो रहा है | मैंने खुद अनेक देशों में देखा है | इसी लिए पहले ज्ञान का वितरण होना चाहिए जिस कार्य को आप ने जोड़ा है ऋषि विचारों को औरों तक पहुंचाना |
लोगों के पास अगर ऋषि कृत ज्ञान पहुंच जाये तो वह अपने आप को बना लेंगे और दूसरों को भी बना पाएंगे | जिस कार्य को आप कर रहे हैं कारण ज्ञान के आभाव से ही तो दुसरे के संपत्ति पर काबिज होते हैं | अगर ज्ञान होगा तो लोग इससे बचेंगे | आप उसी ज्ञान को वितरित करने में अपना समय दे रहे हैं भले ही आप के संपर्क में लोगों को भेजता हूँ -लेकिन उन्हें ज्ञान देने का काम तो आप ही कर रहे हैं =परमात्मा आप को और शक्ति दें यही विनती करता हुवा आपका महेन्द्रपाल आर्य – १३ /११/१९
यह कार्य मेरे परम मित्र श्री भाई मगनलाल जी दीवानी द्वारा हो रहा है नये नये भीमआर्मी से लेकर वैदिक धर्म में दीक्षा दुसरे मत पंथ वालों को वैदिम धर्मी बनाने का काम बिना थके भाई मगनलाल जी कर रहे हैं |
 
अभी एक बड़ी टीम को गुजरात में उन्हों ने नये नये लोगों को ऋषि कृत सत्यार्थ प्रकाश वितरण किया है | मुंबई में भी इसी प्रकार का कार्य आप का निरंतर जारी रहता है | इसमें एक दो बच्चे ऐसे भी हैं जो महेद्रपाल आर्य जैसा ही कुरान पढ़कर सुनाते हैं = अशुद्ध नहीं बिलकुल शुद्ध रूपसे मुझे सुन सुन कर मेरे व्याखान को रटा है | यह सभी श्र्येय भी भाई मगनलाल जी को ही जाता है |
 
महर्षि दयानंद जी ने आर्य समाज की स्थापना १८७५ में गिरगांव मोहल्ला में डॉ ० मानिक राव के घर की थी | उस समय से निरंतर आर्य समाज का प्रचार मुंबई शहर के विभिन्न इलाके में आर्य समाज मन्दिर बनाकर लोग अधिकारी बनकर आर्य समाज में कहीं विद्यालय – कहीं औषधालय – और कहीं बिवाह का कार्य क्रम चलाया रहे है |
 
ऋषि दयानंद जी का जो उद्देश्य था मानव समाज को वेद और वैदिक मान्यता के साथ जोड़ना | घर घर वेद को पहुंचाना मानव समाज को वैदिक मान्यतानुसार =ईश्वर =वेद = और वैदिक धर्म के साथ जोड़ना = राष्ट्र और राष्ट्रीयता को कूट कूट कर भारत वासियों में भरना |
 
आज आर्य समाज से ऋषि का मंतव्य लुप्त ना होने पाय इसी मंशा और उद्देश्य को लेकर मेरे परम मित्र और सहयोगी ऋषि दयानंद जी के अनन्य भक्त दर्शन शास्त्र को अपने जीवन में अक्षर स: उतारने का प्रयास करने वाले भाई श्री मगनलाल दीवानी जी तन मन धन तीनों को सपर्पित करते हुए महाराष्ट्र और गुजरात दोनों ऋषि के जन्मस्थली और कर्मस्थली = इन दोनों जगहों में ऋषि कृत ग्रथों के प्रचार प्रसार में लगे हुए हैं |
 
हमारे भाई जी ने लिखा है विद्यालय और औषधालय से लोगों को लाभ ही होगा ? जी बिलकुल होगा – आप के मुंबई महानगरी में हुवा भी है -आप को कहते कहते जिस काकड़ वाडी आर्य समाज का सदस्य बनवाया – उसी समाज में ही हुवा है = विद्यालय खोला था जिस जगह पर, वह आर्य समाज के हाथ से निकली लाभ हुवा या नुकसान ?
 
यह मात्र एक आर्य समाज में नहीं भारत हो या अन्य देशों में हो सभी आर्य समाजों में यही हो रहा है | मैंने खुद अनेक देशों में देखा है | इसी लिए पहले ज्ञान का वितरण होना चाहिए जिस कार्य को आप ने जोड़ा है ऋषि विचारों को औरों तक पहुंचाना |
लोगों के पास अगर ऋषि कृत ज्ञान पहुंच जाये तो वह अपने आप को बना लेंगे और दूसरों को भी बना पाएंगे | जिस कार्य को आप कर रहे हैं कारण ज्ञान के आभाव से ही तो दुसरे के संपत्ति पर काबिज होते हैं | अगर ज्ञान होगा तो लोग इससे बचेंगे | आप उसी ज्ञान को वितरित करने में अपना समय दे रहे हैं भले ही आप के संपर्क में लोगों को भेजता हूँ -लेकिन उन्हें ज्ञान देने का काम तो आप ही कर रहे हैं =परमात्मा आप को और शक्ति दें यही विनती करता हुवा आपका महेन्द्रपाल आर्य – १३ /११/१९