|| मूर्ति पूजा पर ऋषि दयानन्द ने सत्य कहा ||

|| मूर्ति पूजा पर ऋषि दयानन्द ने सत्य कहा ||

सत्य सनातन वैदिक धर्म में मूर्ति या पाषाण पूजने के लिए हमारे ऋषि मुनियों ने सर्वथा निषेध किया है, और वैदिक काल में मूर्ति पूजा हमारे महापुरुषों ने किसी ने भी नही की | हमारे ऋषि मुनियों ने सर्वथा मूर्ति पूजने से हमें रोका है, जैसा बाबा तुलसी दास ने भी अपने रामचरित मानस में मर्यादा पुरुषोत्तम राम और लक्ष्मण जी के लिए दर्शया है ‘संध्या करन चले दोऊ भाई’ इससे यह सपष्ट है की बाबा तुलसी दास जी के द्वारा भी हमें मिल रहा है, राम और लक्ष्मण दोनों भाई संध्या किया करते थे |

यानि जिस संध्या में आर्य समाज के संस्थापक ऋषि दयानंद जी ने वेद से ही उन्नीस मन्त्रों को लिया है, जिसे हम संध्या कहते है, वही संध्या राम और लक्ष्मण जी भी किया करते थे, यह बाबा तुलसी दास जी स्वयं लिख रहे है |

दूसरा प्रमाण यह है, जब यह लोग मंदिर में आरती उतारने लगते है उसमें भी यही शब्द उच्चारण करते है तुम हो ‘एक अगोचर सबके प्राण पति’ विचारणीय बात यह है मंदिर में एक नही अनेक मूर्तियों को सजाकर रखा गया, फिर यह किसे कहते है की तुम हो एक, और वह भी अगोचर(जो आंख से दिखाई न पड़े )?

जब आंख से दिखाई न देने वाले का नाम अगोचर है, तो वह अगोचर कौन है भला ? यहाँ पर भी बात स्पष्ट हो गई परमात्मा एक है और आँख से देखने वाली वस्तु नही है | यही कारण बना वेद अनुसार परमात्मा यह पांच ज्ञान इन्द्रियों से संपर्क रखने वाला नही है |

(रूप, रस,गंध, शब्द और सपर्श ) रूप आंख का विषय है , रस जीभ का विषय है,गंध नाक का विषय है, शब्द कान का विषय है और स्पर्श त्वचा का, जिसे अरबी में हम ‘कुवते हिस’ कहेंगे | यह पांच बाते परमात्मा में पाया जाना संभव नही यही कारण है की वह अगोचर है, जो आंख से देखने वाली चीज़ नही |

तो जो लोग परमात्मा को आँख से देखना चाहते हैं, वेद उनही को अज्ञानी बताया है देखें यजुर्वेद के 40 अध्याय को तत्जती वाला मन्त्र में स्पस्ट बताया है की परमात्मा को खोजने वाला ज्ञान से परे है | कारण इस मन्त्र में यही उपदेश है की परमात्मा ज्ञानी के लिए नजदीकसे भी.नजदीक हैं, और अज्ञानी के लिए दूर से भी दूर हैं |

उस परमात्मा को पाने के लिए ज्ञान की जो दुरी है उसे मिटाना पड़ेगा | रही बात मूर्ति पूजाकी तो यहाँ भी ज्ञान से ही पूजना पड़ेगा बिना ज्ञान के मात्र मूर्ति पुजा ही नही अपितु हर काम को करने के लिए ज्ञान चाहिए | यहाँ तक की मानव हम तभी कहला सकते हैं जब हर काम को ज्ञान पूर्वक करेंगे, शास्त्र का अदेश है मत्वा कर्मणि सिव्व्ते |

अर्थात मानव वही है जो ज्ञानी हैं ज्ञान पूर्वक कार्य करें अकल से काम करें बुद्धि से काम लें आदि | अब देखें की मूर्ति पूजने वाले बुद्धि से काम ले रहे हैं अथवा नही यह विचार करें | पहला सवाल होगा की मुर्ति पूजने वाले किस की पूजा करते हैं, मूर्ति की अथवा परमात्मा की ?

और पूजा किसकी करनी चाहिए, मूर्ति पूजने वाले भी यही मानते हैं, की मूर्ति में परमात्मा हैं | मतलब स्पस्ट हो गया की मूर्ति ईश्वर नही है, किन्तु मूर्ति में ईश्वर है, अब यहाँ दो बातें होगी एक मूर्ति, और उसके अन्दर परमात्मा, यानि मूर्ति में परमात्मा | खुलासा यह हुवा परमात्मा अलग है और मूर्ति अलग ? अब मै इन्ही मूर्ति पूजकों से पूछता हूँ, की क्या परमात्मा मूर्ति के बाहर नही हैं ? अगर मूर्ति के बाहर भी परमात्मा हैं, तो भक्त पूजना किसको चाहता है मूर्ति की या परमात्मा की ? जब पूजा परमात्मा की करना चाहता है,और वह परमात्मा मूर्ति से बाहर भी है तो फिर उस मूर्ति के अन्दर वाले परमात्मा को पूजना किस लिए चाहता है ?

जैसा मुझे किसी से मिलना है मैं उनके घर गया अगर वह आदमी मुझे उन्हीके दरवाजे पर मिल जाय, तो मैं उनके मकान के अन्दर इस कमरे में उस कमरे में खोजूंगा अथवा जहाँ वह मिले है उसी जगह में अपनी बात यानी सब वेदना उनको सुना दूंगा ?

यहाँ भी बात यही है हमें मिलना परमात्मा से है और वह हमें मूर्ति से बाहर मिलेंगे तो उन्हें अपनी बात कहने में क्या परेशानी होगी ? इसका मतलब यह निकला की हमने ज्ञान का प्रोयोग ही नही किया, हमने यह नही जाना कि हमें मिलना किससे चाहिए परमात्मा से अथवा मूर्ति से ?

और वेद इसी को ही अज्ञानी कहा है, दूसरी बात यह भी है की हमारे वैदिक परम्परा का उजागर करने वाले आदि गुरु शंकराचार्य जी ने मरते दम तक मूर्ति पूजा से रोकते रहे हिन्दू कहलाने वालों को, उन्हों ने अपने जीवन काल में ना मालूम कितनी मूर्तियाँ तोड़ी औरों से तुडवाई ?

राजा महा राजाओं से मिलकर मूर्तियों को तोड़ना अनिवार्या कर दिया था | ऋषि दयानन्द जी ने उनके समर्थन में कहा, की शंकराचार्य अगर जैनियों को मात देने के लिए अहम्ब्रह्मास्मि का सहारा लिया,तो वह क्षमा करने योज्ञ हैं |

राजा राममोहन राय ने भी मूर्ति पूजा का विरोध किया ऋषि अरविं ने भी मूर्ति नहीं पुजते थे, वह तो सिर्फ भारतीय नक्शे को सामने रख कर ध्यान लगा ते थे | ऋषि दयानंद से पूछा = मूर्ति पूजा कहाँ से चली ? ऋषि ने उत्तर दिया=जैनियों से फिर पूछा जैनियों ने कहाँ से चलाई ? ऋषि ने उत्तर दिया=अपनी मुर्खता से, देखें सत्यार्थप्रकाश | मतलब मेरा कहने और प्रमाणदेने का यह था की मूर्ति पूजा हमारा है ही नहीं जैनियों का ही है |

महेन्द्रपाल आर्य =वैदिक प्रवक्ता =9 /1 /21