ऋषि दयानन्द जी ने वेद को ही ईश्वरीय माना है ||

ऋषि दयानंद जी ने मात्र वेद को ही ईश्वरीय माना हैं ||
आज दुनिया के लोग आदि गुरु शंकराचार्य को वेद उद्धारक कहते है, यह कहाँ तक सत्य है की शंकर ने वेद का उद्धार किया ? कारण उद्धार तो किसी चीज की तब होगी जब उसका पतन हो या फिर लुप्त हो गयी हो | यह तो कभी भी नहीं हुवा की वेद का पतन हो गया हो,लुप्त हो गयी हो,जब यह सब हुवा ही नहीं तो फिर वेद का उद्धार किस प्रकार किया ?
 
बल्कि मै तो यह कहूँगा की शंकराचार्य वेद को जानते थे या नहीं दयानन्द को पढ़ने से ही पता चल सकेगा | कारण वेद में कही नहीं आया अहम्ब्रह्मस्मी, यह शब्द जब वेद में है नहीं तो शंकराचार्य का कहना वेदका उद्धार किस प्रकार हुवा ?
 
अपनी मनमानी बातों को कह कर वेद को बदनाम करने की साजिश नहीं है ? और भी मनमानी बातें हैं उनकी, स्त्रीशुद्रौ न धीयताम | स्त्री और शूद्रों को वेद पढ़ने का अधिकार नहीं, यह भी वेद में कहीं नहीं आया, नरकस्य दुवारम नारी, को नरक द्वार कहना यह भी कहना किस प्रकार सही है की नारी नरक का दरवाजा है | क्या शंकराचार्य धरती पर किसी और दरवाजे से आये ? अगर उनकी माँ न होती वह कहाँ से आते, तो जिन्होंने अपनी माँ को नरक का दरवाजा बताएं उन्हें वेद का उद्धार करने वाला बताना यह कहाँ तक सही है ?
 
अब दयानन्द को देखें, ऋषि ने कहा हम सब ब्रहम नहीं, किन्तु हम सबमे ब्रहम है, कारण हम सब अगर ब्रहम हों, तो जो गुण उस ब्रहम में है वही गुण हममें भी होनी चाहिए | अगर हम ब्रहम हों तो वह ब्रहम आनन्द स्वरूप है जो कभी आनन्द से बंचित नहीं होते, या सुख दुःख लाभ हानी में जो नहीं फंसते हम उसके जैसे कैसे हो सकते हैं भला ?
 
ऋषि दयानन्द ने मात्र कहा ही नहीं, वेदका प्रमाण भी दिया दुवा सुपर्णा सयुजा सखाया – यहाँ ऋषीने तीनो को अलग अलग कर बताया,ईश्वर –जीव –प्रकृति =यह अलग,अलग, तीन सत्ताएं हैं –इनका भेद भी बताया –
 
परमात्मा ज्ञान में पूर्ण है –प्रकृति –ज्ञान शून्य –है =जीवात्मा –कुछ ज्ञान –और कुछ अज्ञान –दोनों को लेकर हैं,अगर यह जीव वही परमात्मा का अंश होता तो परमात्मा को ढूंडता किसलिए ? शंकर की बात अपने आप ही कट गयी,अथवा मिथ्या प्रमाणित हो गया |
 
यह सब कुछ होने पर भी दुनिया के लोगों ने ऋषि दयानन्द को वेद उद्धारक नहीं कहा ,और न दयानन्द का नाम ही लेना चाहते | मात्र यही तक नहीं शंकर ने ब्रहम सत्य,जगत मिथ्या बता दिया,मतलब यह हुवा की जिस जगत में खड़े हैं उसी जगत को ही मिथ्या बता दिया | मत लब यह हुवा की झूट बोल रहे,जहाँ खड़ा है उसको मिथ्या मानना मिथ्या बोलना ही तो हुवा ?
 
अब कौन सी बात इनकी सही है वह खुद ही जान पाए की सही क्या है और गलत क्या है ? यहाँ शंकर ने नारी को नरक का दरवाजा कह दिया किन्तु दयानन्द वेद का प्रमाण देकर कहा, परमात्मा नारी को ब्रह्मा कहा,मनु ने बताया जहाँ नारी की पूजा होती है वहां देवता का निवास होता है, तो सही किसका ?
 
यही शंकर का शिकार बाबा तुलसी भी बने,और कहदिया ईश्वर अंश जीव अबिनाशी | क्या अबिनाशी होने के लिए ईश्वर का अंश होना पड़ेगा ? पहली बात तो यह होगी की ईश्वर ठोस है या तरल कारण अंश का होना जभी संभव होगा –की वह ठोस हो अथवा तरल, या फिर गेस तो वह ईश्वर में यह है ही नहीं तो अंश का होना झूठ होगया | दूसरी बात है की अबिनाशी तो प्रकृति भी है तो उसे ईश्वर का अंश किसलिए नहीं माना ?
कारण प्रकृति भी अनादी है,जैसा जीव और परमात्मा | अब अंश किस लिए नहीं दयानन्द से सुनें, की अगर यह जीव उसीके अंश है तो जो गुण उसमे है वही गुण जीव में भी होना चाहिए ? जैसा सुख दुःख,लाभ. हानी, इच्छा . राग, द्वेष, सर्दी,गर्मी,ज्ञान इन्द्रियों, तथा कर्म इन्द्रियों,से ईश्वर दूर हैं जो जीवात्मा में है |
 
इसके बावजूद कोई कहे की ईश्वर का अंश यह जीव है, तो लोग उन्हें पढ़े लिखों में गिनती करेंगे अथवा अपढ़ों में? दूसरी बात है की जब आप किसी का अंश निकालेंगे तो उसमे कमी आ जायेगी, यही कारण है की ऋषि दयानन्द कह रहे हैं, की परमात्मा ज्ञान में परिपूर्ण है उनके ज्ञान मे से ज्ञान निकालेंगे तो कमी नहीं आएगी |
 
और अंश उसका है नहीं तो उसमे से निकला यह बात अपने आपही कट गयी | उदाहरण के लिए कहीं अग्नि की ढेर लगी है, उसमे से थोड़ी अग्नि को निकालेंगे तो जो गुण उस ढेर वाली अग्नि में है वही गुण इन निकली हुई अग्नि में भी होनी चाहिए, तो परमात्मा में जो गुण है वह जीवात्मा में किसलिए नहीं है ?
 
यही तो प्रमाण ऋषि दयानन्द जी दे रहे हैं वेद से निकाल कर, की यह तीनो अलग अलग सत्ताएं है, और तीनो समकालीन है आगे पीछे नहीं बराबर से हैं | यही मान्यता कुरान और बाईबिल वालों की है वह भी कहते है पहले अल्लाह, या गॉड है बादमे यह सब हैं यानि समकालीन नहीं मानते |
 
इन लोगों की मान्यता है की अल्लाह ने सब कुछ बनाया,ऋषि ने वेद का हवाला देकर कहा बनाने का तीन कारण होना चाहिए, उसके बिना किसी भी चीज का बनना संभव नहीं हो सकता | जैसा कुम्हार, चाक, और मिट्टी का प्रमाण दिया, मिटटी न हो तो कोई सामान मिटटी का नहीं बन सकता | चाक न हो तो भी बनना कैसा हो सकेगा,और बनाने वाला न हो तो सामान कैसे बन सकता भला ?
 
कुरान का कहना है अल्लाह सिर्फ कुन कहेंगे तो हो.जायेगा पर विचारणीय बात है की जब दुनिया बनाने से पहले कोई वस्तु थी ही नहीं तो अल्लाह ने किस को कहा होजा,कारण हो जा एक आदेश है,और आदेश देना जभी होगा जब सामने कोई हो ?
 
अब कहीं कुछ है नहीं तो यह आदेश किस के लिए है की हो जा ? बात यह भी परी पक्क्व नहीं है | इसी का शिकार बने स्वामी विवेकानन्द जी,उनकी मान्यता है प्रत्येक आत्मा अव्यक्त ब्रहम है, अब व्यक्त करने और न करने के लिए कोई ब्रहम कैसे होगा भला ?
 
जब सभी आत्माएं ब्रहम है फिर यह ब्रहम की खोज किसलिए करते हैं ? फिर साधना की ज़रूरत ही कहाँ रहेगी, साधना भी परमात्मा से अपने को जोड़ने के लिए ही की जाती है | कुछ लोगों का मानना है की स्वामी विवेकानन्द. ने जो नवीन वेदांत को दिया है, वह वेद का अंत है, अब प्रश्न खड़ा हो गया की वेद का प्रारंभ पहले है या फिर अंत ?
तो अगर प्रारंभ ही उन्होंने नहीं की तो वह अंत कहाँ से पाते भला ? हर दशा में हर दिशा में सवालों में घिरे हैं सत्य के सामने, और हमने सत्य को जानने का प्रयास ही नहीं किया | फिर स्वामी विवेकनन्द मूर्ति पूजा का समर्थन किया,और विरोध भी कर रहे हैं, की मूर्ति पूजा प्राथमिक क्लास की पढाई है, घटिया दर्जे की उपासना है अगर बढिया दर्जे वाला हमारे पास हो तो हम घटिया वाली किस लिए करें ?
 
यह बात समझ दारो के लिए मानना कैसे संभव हो सकेगा भला, अगर प्राथमिक क्लास की पढाई है तो लोग बचपन से लेकर मरने तक उसी क्लास में रहेंगे क्या उससे आगे कॉलेज और विश्व विद्यालय में जाना ही नहीं ?
प्राथमिक क्लास में ही जिन्दगी खपा देंगे क्या ? यह कौन सी बुद्धिमानी की बात हुई | रही बात की मूर्ति पूजा घटिया दर्जे की उपासना है, यह बात भी युक्ति युक्त नहीं कारण अगर हमारे पास बढ़िया दर्जे की उपासना है तो हम घटिया दर्जे की उपासना किस लिए करें ? यह बात दयानन्द ने जो वेद को सामने रख कर दिया है उसपर यह कहीं भी नहीं जम सकते | पर दुनिया के लोग तो सत्य का मानना ही नहीं चाहते, अगर यह सत्य को मान लेते तो दयानन्द को विष किसलिए देते ? तो दयानन्द के दृष्टि में एक मात्र वेद को ही सत्य माना और कहा है | पर यह जितने भी हैं सबने वेद को जानने तक का प्रयास ही नहीं किया |
 
कबीर को संत शिरो मनी कहरहे हैं, जो कबीर परमात्मा को जानता ही नहीं, अगर वह परमात्मा को जानते तो यह कहना ही नहीं पड़ता | कबीरा मन मिर्मल भयो जिस गंगा की नीर,पीछे पीछे हरी फिरे कहत कबीर कबीर |
अब पढ़े लिखे लोग बताएं की अगर हरी यानि परमात्मा को कबीर के पीछे फिरना पड़े तो बड़ा कौन है परमात्मा या कबीर ?
 
लोगों की बुद्धिमानी ख़त्म हो गयी की कबीर के सामने परमात्मा को भी बौना बता दिया | फिर परमात्मा सर्ब शक्तिमान किस प्रकार सिद्ध हो सकेंगे भला ? यानि दयानन्द के नजरों में यह सब वेद विरुद्ध है,और यह मात्र कहा ही नहीं अपितु यह सिद्ध कर दिखाया, किन्तु लोग असत्य को ही अपनाना अपना धर्म मानते हैं | धर्म पसंद ही नहीं और न सत्य को धारण करना चाहते ऋषी ने लिखा सत्य को धारण करने और असत्य को छोड़ने में सर्वदा उद्यत रहना चाहिए, किसी एक को नहीं किन्तु मानव मात्र को |
 
ठीक इसी प्रकार इस्लाम और ईसाईयत ने भी,अल्लाह,और ईश्वर का नाम लेकर तथा कुरान और बाईबिल जैसे बिज्ञान विरुद्ध ग्रन्थों को ईशग्रन्थ बता कर मानव समाजको सिर्फ विभाजित ही नहीं किया, अपितु मानव को मानव का खुनका प्यासा बनादिया,इसका जीता जगता उधारण अब्दुल करीम टुंडा, यासीन भटकल, और मुज़फ्फर नगर कांड, पटना की ताजा घटनाक्रम,उडिस्या का पादरी कांड सामने ही हैं |
इस प्रकार मात्र भारत में ही नहीं सम्पूर्ण दुनिया में यही चल रहा है |
महेन्द्र पाल आर्य =7 /1 /21 =