वेद कहता है मानव बनो, कुरान व बाइबिल, ईसाई, मुस्लमान बनने को कहा |

|| वेद कहता है मानव बनो, कुरान कहता है मुस्लमान बनो ||

तन्तुं तन्वन रजसो भानुमिन्विहि, ज्योतिष्मतः पथो रक्ष धिया कृतान |

अनुल्बणं वयत जोगुवामपो, मनुर्भव जनया दैव्यं जनम् || [ऋ १०|५३|६]

संसार को सदा जिसकी आवश्यकता रही है और रहेगी तथा इस समय भी जिसकी अत्यंत आवश्यकता है उस तत्त्व का उपदेश इस मन्त्र में किया गया है | वेद में यदि और उपदेश न होता केवल यही मंत्र होता तब भी वेदं का आसन संसार के सभी मतों और सम्प्रदायों से उच्च रहता |

| वेद कहता है – मनुर्भव – मनुष्य बन |

आज का संसार ईसाई बनने पर बल देता है, अर्थात ईसा का अनुकरण करने के लिए यत्नवान है | संसार का एक बड़ा भाग बौद्ध बनने में लगा हुआ है, अर्थात बुद्ध के चरण चिह्नों पर चलता हुआ बुद्धं शरणं गच्छामि का नाद गुंजा रहा है | इसी प्रकार संसार का एक भाग मुहम्मद का अनुगमन करने में तत्पर है | महापुरुषों का अनुकरण प्रशंसनीय है | किन्तु थोडा सा विचार करें तो एक विचित्र दृश्य सामने आता है अद्भुत तमाशा देखने को मिलता है |

ईसाई ने ईसा का नाम लेकर जो कुछ अपने भाइयों के साथ किया उसकी स्मृति ही मनुष्यों को कंपा देती है | बिल्ली के बच्चे तक की रक्षा करने वाले मुहम्मद की उम्मत का इतिहास भी भाइयों के रक्त से रंजित है | जिसे मुष्य कहते है वह मनुष्यता का वैरी हो रहा है | हमने संकीर्णता के कारण संकुचित दल बना डाले | एक दल दुसरे दल को कुचलने के लिए तत्पर है | आज मनुष्य मनुष्य का वैरी हो रहा है | अतः वेद कहता है मनुर्भव- मनुष्य बन |

ईसाई या बौद्ध या मुस्लमान बनने या किसी दुसरे सम्प्रदाय में सम्मिलित होने में वह रस कहाँ जो मनुष्य बनने में है | ईसाई बनने से केवल ईसयों को ममत्व से देखूंगा, बौद्ध हो ने से अन्य सबको असद्धर्मी मानूंगा, मुस्लमान होकर मोमिनों को ही अपने प्यार का अधिकार मानूंगा | किन्तु मनुष्य बनने पर तो संसार मेरा परिवार होगा सब पर मेरा एक सामान प्यार होगा | वसुधा को कुटुंब माना तो सारे कुटम्ब को प्यार करना चाहिए कुटुम्ब में समता का साम्राज्य होता है विषमता का व्यवहार कुटुम्ब की एकता पर वज्रप्रहार है | समतास्थिर रखने के लिए ही स्नेह का व्यवहार करना होता है तभी तो वेद ने कहा –                      मित्रस्य चक्षुषा समीक्षामहे [यजु ३६|१८]

सब को मित्र की स्नेहशील आँख से हम देखे | यहाँ वेद मनुष्य सीमा से भी आगे निकल गया प्यार का अधिकारी केवल मनुष्य ही न रहा वरन सब भुत प्राणी हो गए | यह उचीत भी है क्योंकि मनुष्य शब्द का अर्थ है – मत्वा कर्मणि सीव्यति अर्थात जो विचार कर कर्म करे अन्धाधुन्ध कर्म न करे | कर्म करने से पूर्व जो भली प्रकार विचारे की मेरे इस कर्म का क्या फल होगा ? किस-किस पर इसका क्या प्रभाव होगा? यह कर्म भूतों के दुःख प्राणियों की पीड़ा का कारण बनेगा या भुतहित साधेगा?

मनुष्य यदि सचमुच मनुष्य बन जाये तो संसार का सारा उपद्रव दूर हो जाये | धार्मिक दृष्टि से विचारें तो मनुष्य समाज के दो बड़े विभाग बन सकते है एक ईश्वरवादी और दूसरा अनीश्वरवादी | सभी ईश्वरवादी ईश्वर को पिता मनाते है और वेद ईश्वर को पिता के साथ साथ माता भी मानता है, और बन्धु व सखा भी मानता है | पर यह मान्यता कुरान तथा बाइबिल की नहीं है, और ना बौधों की है | इन्हों ने ने परमात्मा को मानने से भी इंकार किया |

ईसाइयों ने मन तो मात्र ईसा मसीह का पिता माना परमात्मा को, इस्लाम ने पिता मानने और कहने से भी मना किया | मनुष्य अगर सचमुच मनुष्य बन जाए तो संसार से सारा उपद्रोब ही दूर हो जाय | थोडा विचार करके देखें मानवता को जानिए वेद के इन उपदेश को हृदयंगम करें और धर्मिक दृष्टि से विचार करें, तो मनुष्य समाज में दो बड़े विभाग बन सकते हैं _एक ईश्वर वादी –दूसरा अनीश्वरवादी |

अब ईश्वरवादी प्रार्थना करता है प्रभु हमारे माता, पिता,है हम उनके सन्तान हैं, किन्तु कुसन्तान, जघन्य सन्तान, अयोग्य सन्तान विद्रोही सन्तान न बने | और जो अनिश्वरवादी है उसे तो यह पता ही नहीं है की वह सन्तान है अथवा नहीं ? और अगर हैं भी तो किनके सन्तान हैं ?

मानवों को सावधान हो कर सुनना चाहिए, और हमें घबराना नहीं चाहिए,हमें आचम्भित भी नहीं होना चाहिए | हम माता और पिता दोनों के सन्तान है किसी एक के संयोग से मनुष्य सन्तान की उत्पत्ति नहीं कर सकते | एकेली स्त्री या एकला पुरुष सन्तान नही पैदा कर सकते |प्रकृति पुरुष का, रयी प्राण का संयोग आवश्यक है | अर्थात दो मिले तो हम और आप धरती पर आयें | वैदिक मान्यता है वसुधा हमारा कुटुम्ब है हम एक दुसरे के भाई हैं आदि | यही वेद का उपदेश मनुर्भव कल्याण करी कल्याण साधक है अथवा नहीं ?

ईसाई, मुसलमान, सिख, जैनी बौधि बन्ने से ऊपर उठो मानव बनकर जिओं, मानवता को बर करार रखते हुए मरो मानव मात्र से आशीर्वाद लेकर मरो | ईसाई, मुसलमान जनि बौधि, बनने पर मानव मात्र का आशीर्वाद नहीं मात्र एक वर्ग या सम्प्रोदाय का ही आशीर्वाद मिलेगा मानव मात्र का नहीं | इस लिए हमें मानव बनना चाहियें, धन्यवाद के साथ |

महेन्द्रपाल आर्य =वैदिक प्रवक्ता = 13 =5 =18 =