वेद ही अखिल विश्व के धर्म का आदि मूल है ||

|| वेदो अखिलो धर्म मूलम् ||
वेद ही अखिल विश्व के धर्म का आदि मूल है |
 
आयें हम मानव कहलाने वाले जरा विचार करें, आज धरती पर जितने भी मानव कहलाने वाले, या सम्प्रोदाय कहलाने वाले हैं, सब ने अपना अपना, कुछ ना कुछ मान्यता ले कर चले हैं |
 
जैसा हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, जैनी, बौधि, बहाई आदि आदि, आज धर्ती पर इन सब को मानव समाज में धर्म कहते हैं | और इन की सब की अलग अलग पुस्तक का नाम भी अलग अलग है | जिसे धर्म पुस्तक कहते हैं अथवा मानते हैं, या फिर उन पुस्तकों को धर्म पुस्तक के नाम से दुनिया के लोग जानते हैं या फिर कहते हैं आदि |
 
परन्तु वेद ही एक ऐसी ग्रन्थ है जो किसी जाती, वर्ग, और सम्प्रोदाय या किसी मुल्क वालों के लिए नहीं है | यह विश्व के मानव मात्र के लिए है परमात्मा का दिया ज्ञान है | { यथेमाम वाचं कल्याणी आवदानी } बताया अर्थात यह कल्याणी वाणी मानव मात्र के कल्याण के लिए है |
 
जैसा कुरान,मात्र मुसलमानों का है, बाइबिल मात्र ईसाइयों का है, पुराण सिर्फ हिन्दुओं का है, त्रिपिटक, बुधिष्टों का है, आदि आदि यह जितने भी हैं सभी ग्रन्थ किसी न किसी वर्ग विशेष से जुड़ा हुवा है |
 
परन्तु वेद किसी भी वर्ग विशेष या सम्प्रोदाय वालों का नहीं है यह अखिल विश्व के मानव कहलाने वालों के लिए है | ना की हिन्दुओं के लिए न किसी वर्ग वालों के लिए |
पर अफ़सोस तो यह है की यही मानव कहलाने वालों ने ही, वेद को नहीं जाना और ना जानने का प्रयास किया और न करना चाहा |
 
कारण वेद उन्हीं परमात्मा का दिया ज्ञान है, जिसने चाँद, सूरज, आकाश,वायु ,जल धर्ती पर जितने भी सामान हैं, जिसने मानव मात्र को समान रूपसे दिया है बिना भेद भाव के सभी मुल्क वालों को दिया है किसी को कम, किसी को ज्यादा नहीं किन्तु सब को समान रूप से दिया है |
 
किन्तु हम मानव कहलाने वालों ने इस सत्यता को नहीं जाना, अपितु उसी परमात्मा के नाम से या उसी दुनिया के बनाने वाले के नाम से हम मानव कहला कर भी महज झगडा करने लगे है, जो मानवता पर सरासर कुठाराघात हो रहा है |
इसे जानने और समझने को ही तैयार नहीं और उल्टा एक दुसरे से झगडा करने में या फिर हत्या करने में भी संकोच नहीं करते |
 
आयें इसी विषय पर हम जरा चिंतन और विचार करें और मानव कहला कर परमात्मा का दिया ज्ञान जो मानव मात्र के लिए है उससे लाभाम्न्वित हो कर खुद सुख प्राप्त करें औरों को भी सुखी बनाएं |
महेन्द्रपाल आर्य =वैदिक प्रवक्ता = 12 =5 =18