सृष्टि उत्पत्ति व, धर्म वेद्से हटते हटते मतों का जन्म हुवा | भाग 12

||सृष्टि उत्पत्ति व,धर्म वेदसे,हटते हटते,मतों का जन्म,भाग 12 ||

धर्मिक कृत्य और मन्तव्यों की उपयुक्त समानताओं के अतिरिक्त कुछ अन्य छोटो छोटी बातों में भी सदृश्य है, उन्हें भी देखते हैं  |

बाइबिल से पतालगा की ईश्वर ने सिनाई पर्वत पर हज़रत मूसा को दस {10} आदेश दिए | और मूसा खुदा के पास गया |खुदा ने मूसा को पहाड़ पर बुलाया, और कहा की तू याकूब के घराने से इस प्रकार कहेगा, और इस्राईल के बालकों को इस प्रकार बतायेगा | बाइबिल यात्रा की पुस्तक =अ० 19 -3

मूसा पहाड़ पर गया और बादल ने पहाड़ को ढक लिया|अ०12से15 =

 

इसी प्रकार हम जिन्दअवेस्ता में देखते है कि अहुरमजदा पवित्र प्रश्नों के पर्वत पर” अहुर से बातचीत करता है | फरगर्ट =12 -19 =

 

हज़रत नुह के नौका सम्वन्धी कथा जेंन्दअवेस्ता के यिम के पर की कथा से बहुत सदृश्ता रखती है | बाइबिल में लिखा है –ईश्वर ने देखा की पृथ्वी पर मनुष्य की अशिष्टता बहुत कुछ बढ़ गई है, और इसके कारण उसे पश्चाताप हुआ की उसने मनुष्य को पृथ्वी पर वृथा पैदा किया | इस बात ने उसके हृदय को बहुत दु:खित किया और ईश्वर ने कहा मैं मनुष्य का जिसको मैंने पैदा किया है भूतल से संहार करूंगा | मनुष्य और पशु रेंगनेवाले जीव और वायु में उड़नेवाले सब पक्षियों को मिटा दूंगा,क्यों कि मुझे पश्चाताप होता है कि मैंने उन्हें बनाया, परन्तु नूह ने ईश्वर की सृष्टि में दया का स्थान प्राप्त किया | ईश्वर ने नूह से कहा कि समस्त जीवधारियों का अंत मेरे सामनेआ गया है|

तू सनोहर की लकड़ी की एक नाव बना, तू इस नाव में कोठरियां बना और देख | मैं स्वयंम इन सब जीव धारियों का जितने में जीवन का श्वास है आसमान के नीचे से नाश करने के लिए जल प्रलय करूंगा | इससे पृथ्वी की समस्त वस्तुएं नष्ट हो जाएंगी, परन्तु तुझ से प्रतिज्ञा करता हूँ कि तू नाव में जायेगा और अपने बेटे, स्त्री और पुत्र वधु को साथ लावेगा | सब प्रकार के प्राणियों में से दो,दो को अपने साथ जीवित रखने के लिए लावेगा | जिस में एक नर और एक मादा होगी, प्रत्येक प्रकार के पक्षियों पशुओं और पृथ्वी पर रेंगनेवाले जीवों में दो, दो, को जीवित रखने के लिए तू अपने साथ लावेगा | उत्पत्ति पुस्तक =6 -5 -8 –13 -20 |

 

इसी प्रकार जिन्दअवेस्ता में अहुरमजदा उस यिम को सूचित करता है जो आदि पुरुष, आदि राजा और सभ्यता का संस्थापक है कि भयानक शीत द्वारा संसार नष्ट होने वाला है |  और अहुरमजदा ने यिम से कहा है विवन्धत के पुत्र सुन्दर यिम प्राकृतिक संहारकारी शीत पतन होने वाला है जो भयंकर और बुरे पाले को अपने साथ लावेगा | भौतिक संसार पर विनाशक शीत का पतन होनेवाला है, जिससे उच्चतम पर्वतों तक घुटनों के बराबर गहरे हिम के पर्त् गिरेंगे और तीनों प्रकार के पशुओं का नाश हो जायगा | जिन्दअवेस्ता =भाग 1 प० 10 -1प० 15 -10 –फरगर्ट 12 1 प० 16 का फुट नोट = भाग –प० 11 |

तब अहुरमजदा यिम को परामर्श देता है कि ऐसा वर बनाया जाए, जिसमें वह अन्य जीवित प्राणियों के जोड़े के साथ शरण पा सके |

इसलिए एक लम्बा वर बना जैसा की घोड़ा दौड़ने का मैदान चारों और होता है | उसमें भेड़, बैल, मनुष्य, श्वान, पक्षी, और लाल प्रज्वलित अग्नि का बीज रख |

उसमें तू प्रत्येक प्रकार के वृक्षों के बीज प्रत्येक प्रकार के फलों के बीज ला जिसमें सबसे अधिक अन्न और सुगंधी हो | प्रत्येक की आदमी उस वर में रहे नष्ट न होने पावे | इस प्रकार देखा गया की जो किस्सा जेन्दअवेस्ता में है, उसी किस्से को बाइबिल में पाया गया इस जल बाढ़ की कथा शतपत ब्राह्मण में भी पाई जाती है की जो वेदों को छोड़कर संस्कृत साहित्य की प्राचीनतम पुस्तकोंमें से है | उसमें बताया गया है की एक मछली ने मनु को सुचना दी की अमुक वर्ष में जल की बाढ़ आएगी, अतएब एक नाव बनाओं और मेरी रक्षा करो | जब बाढ़ अधिक बढ़ने लगे तो तुम नाव में प्रवेश करो, मैं तुमको बचाऊगी |  तदनुसार ही मनु ने किया, आगे यह बतलाया गया है की बाढ़ समस्त जीवों को बहा ले गई, परन्तु मनु महाराज अपने नाव में बह जाने के कारण वर्तमान मनुष्य जाति के पिता हुए|

 

कुरान से देखें हज़रत नूह की घटना को =

قَالَ نُوحٌ رَّبِّ إِنَّهُمْ عَصَوْنِي وَاتَّبَعُوا مَن لَّمْ يَزِدْهُ مَالُهُ وَوَلَدُهُ إِلَّا خَسَارًا [٧١:٢١]

(फिर) नूह ने अर्ज़ की परवरदिगार इन लोगों ने मेरी नाफ़रमानी की उस शख़्श के ताबेदार बन के जिसने उनके माल और औलाद में नुक़सान के सिवा फ़ायदा न पहुँचाया | सूरा 71 नुह =21

وَقَالَ نُوحٌ رَّبِّ لَا تَذَرْ عَلَى الْأَرْضِ مِنَ الْكَافِرِينَ دَيَّارًا [٧١:٢٦]

और नूह ने अर्ज़ की परवरदिगार (इन) काफ़िरों में रूए ज़मीन पर किसी को बसा हुआ न रहने दे

إِنَّكَ إِن تَذَرْهُمْ يُضِلُّوا عِبَادَكَ وَلَا يَلِدُوا إِلَّا فَاجِرًا كَفَّارًا [٧١:٢٧]

क्योंकि अगर तू उनको छोड़ देगा तो ये (फिर) तेरे बन्दों को गुमराह करेंगे और उनकी औलाद भी गुनाहगार और कट्टी काफिर ही होगी |

رَّبِّ اغْفِرْ لِي وَلِوَالِدَيَّ وَلِمَن دَخَلَ بَيْتِيَ مُؤْمِنًا وَلِلْمُؤْمِنِينَ وَالْمُؤْمِنَاتِ وَلَا تَزِدِ الظَّالِمِينَ إِلَّا تَبَارًا [٧١:٢٨]

परवरदिगार मुझको और मेरे माँ बाप को और जो मोमिन मेरे घर में आए उनको और तमाम ईमानदार मर्दों और मोमिन औरतों को बख्श दे और (इन) ज़ालिमों की बस तबाही को और ज्यादा कर | सूरा 71 26 =27 =28

وَلَقَدْ نَادَانَا نُوحٌ فَلَنِعْمَ الْمُجِيبُونَ [٣٧:٧٥]

और नूह ने (अपनी कौम से मायूस होकर)हमें ज़रूर पुकाराथा (देखो हम) क्या खूब जवाबदेने वाले थे|  सूरा 37 सफ्फात =75

وَنَادَىٰ نُوحٌ رَّبَّهُ فَقَالَ رَبِّ إِنَّ ابْنِي مِنْ أَهْلِي وَإِنَّ وَعْدَكَ الْحَقُّ وَأَنتَ أَحْكَمُ الْحَاكِمِينَ [١١:٤٥]

और (जिस वक्त नूह का बेटा ग़रक (डूब) हो रहा था तो नूह ने अपने परवरदिगार को पुकारा और अर्ज़ की ऐ मेरे परवरदिगार इसमें तो शक़ नहीं कि मेरा बेटा मेरे अहल (घर वालों) में शामिल है और तूने वायदा किया था कि तेरे अहल को बचा लूँगा) और इसमें शक़ नहीं कि तेरा वायदा सच्चा है और तू सारे (जहान) के हाकिमों से बड़ा हाकिम है | सूरा 11 हुद= 45

وَنَادَىٰ نُوحٌ رَّبَّهُ فَقَالَ رَبِّ إِنَّ ابْنِي مِنْ أَهْلِي وَإِنَّ وَعْدَكَ الْحَقُّ وَأَنتَ أَحْكَمُ الْحَاكِمِينَ [١١:٤٥]

और (जिस वक्त नूह का बेटा ग़रक (डूब) हो रहा था तो नूह ने अपने परवरदिगार को पुकारा और अर्ज़ की ऐ मेरे परवरदिगार इसमें तो शक़ नहीं कि मेरा बेटा मेरे अहल (घर वालों) में शामिल है और तूने वायदा किया था कि तेरे अहल को बचा लूँगा) और इसमें शक़ नहीं कि तेरा वायदा सच्चा है और तू सारे (जहान) के हाकिमों से बड़ा हाकिम है | सूरा 26 शुयरा 106

बाइबिल में वर्णित अदन की बाग़ की दो नदियाँ अर्थात पिशन, और गिह्न, को वह सिन्धु और फरात बतलाते हैं और अदन के दो वृक्ष अर्थात ज्ञान और जीवन के वृक्ष को श्वेत होम {संस्कृत सोम} उत्पन्न करने वाला, गाँव करन वृक्ष और पीड़ाहीन वृक्ष बतलाते हैं |

परन्तु दोनों वृक्ष के सम्वन्ध में पारसियों का मत है पीड़ाहींन पेड़ और बाइबिल में इसे ज्ञान वृक्ष कहा गया है | दूसरा श्वेत होम का वृक्ष बाइबिल में जिसे जीवन तरू के नाम स्मरण करते हैं | पर इसे भारतीय संस्कृति के अनुसार होम को सोम के नाम से याद किया जाता है | दोनों के विषय में यही विश्वास है कि उनके रसपान करने वाले अमरत्व को प्राप्त होते हैं |

 

अबतक यह बातें सामने आ गई की यहूदियों ने अपने धर्मके मुख्य सिद्धांत जरदुश्तियों से लिया है | अगर यह पूछा जाये कि यहूदी धर्म में कौन सी बात मौलिक व नई है ? इस में वह कौनसी बात है, जो जरदुश्तियों के मत से निराला है और जिसके सम्वन्ध में विशेष प्रकार का ईश्वरीय ज्ञान होने का दावा किया जा सकता है ? ईसाई और यहूदी कदाचित यह उत्तर देंगे कि, यहूदी मत की उत्कृष्टता और उसके ईश्वरीय ज्ञान होनेका यह प्रमाण है कि वे पारसियों की दो ईश्वर वाली शिक्षा की अपेक्षा उत्तमतर है, जहाँ एक ईश्वरवाद सिखाते हैं इसका उत्तर यह है की ईसाईयों के ईश्वरवाद की तो कथा ही क्या है जिसमें त्रेत { अर्थात एक ईश्वर में तीन आत्माओं } की,विलक्षण शिक्षा है | यहूदी लोग भी ईश्वर के सम्वन्ध में ऐसे विचारों का अभिमान नहीं कर सकते, जो पारसियों की अपेक्षा पवित्रतर और उत्तम है | स्पितामा, जरदुशत का अहुरमजदा व ईश्वर सम्वन्धी विचार उस इलाही व जेहोवा {ईश्वर} के विचारों से सर्वथा समानता रखता है जिसका वर्णन हम पुराणी धर्म पुस्तक में बताये हैं वह अहुरमजदा को सांसारिक और आत्मिक जीवनका विधाता,अखिल विश्व का स्वामी काहता है जिसके हाथ में समस्त प्राणी है, वह प्रकाशस्वरुप और प्रकाश का मूल है | वह बुद्धि और ज्ञान स्वरुप है, उसकी अधीनता में सांसारिक और आत्मिक प्रत्येक वस्तु है | यथा {बहुमन } विशुद्ध मन  {अमरताद } अमरतत्व  { होर्बोताद } स्वस्थ  { आशावहिशत } सर्वोत्कृष्ट धर्म,  {अमैती } भक्ति और पवित्रता क्षतबर्य्य प्रत्येक सांसारिक उत्तम वस्तु की बहुलता ये सब बिभुतियाँ वह उस पुरुष को प्रदान करता है, जो मन, वचन, कर्म तीनों में सच्चा है |

 

अखिल विश्व का शासक होने से वह सज्जनों को केवल उपहार नहीं देता प्रत्युत दुष्ट लोगों को दण्ड भी देता है | भलाई और बुराई सुख और दुःख जो पैदा किया गया है वह सब उसी का किया गया है| अहुरमजदा के समान शक्ति शाली एक दूसरा बुरा आत्मा जो सबका सदैव विरोध करता रहता है, यह विचार जरदुश्ती ईश्वरवाद के सर्वदा प्रतिकूल है, यद्यपि पिछले समय की वेन्दीदाद जैसी पुस्तकों से प्राचीन जरदुश्तियों में इस प्रकार के विचार की विद्यमानता सिद्ध हो सकती है |

 

वस्तुतः बाइबिल से एकेश्वरवाद के सम्वन्ध में इससे अधिक पुष्ट और विवरण की अन्वेषण करना वृथा है | दो ईश्वर सम्वन्धी दोष जो  जरदुश्तियों पर बहुधा लगाया जाता है, वह कह सकते हैं कि न तो ईसाई धर्म, और न यहूदी वा मुसलमानी मत से यह बातें हो सकती  हैं | अगर कोई कहे की पारसी धर्म में ईसाई धर्म की अपेक्षा अधिक दो ईश्वरवाद की शिक्षा है जैसा की साधारण त: कट्टर ईसाई ग्रंथकार कहते हैं, अथवा उस विचार का संकेत खोजेंगे की भली बुरी आत्मा की उत्पत्ति अनन्त काल से हुई –जैसा कि इस धर्म के अनभिज्ञ लोग कहा करते हैं तो उनकी अन्वेषणा निरर्थक होगी |

भाग 12 महेन्द्रपाल आर्य =वैदिक प्रवक्ता =6 /5 /18 =