सृष्टि नियम में एक दुसरे का नकल किया है भाग 9 देखें =

सृष्टि नियम,में एक दुसरे का नकल है=भाग 9 को देखें

وَلَقَدْ جَاءَهُمْ رَسُولٌ مِّنْهُمْ فَكَذَّبُوهُ فَأَخَذَهُمُ الْعَذَابُ وَهُمْ ظَالِمُونَ [١٦:١١٣]

कि भूक और ख़ौफ को ओढ़ना (बिछौना) बना दिया और उन्हीं लोगों में का एक रसूल भी उनके पास आया तो उन्होंने उसे झुठलाया || सूरा 16 नहल =113

أَنَّىٰ لَهُمُ الذِّكْرَىٰ وَقَدْ جَاءَهُمْ رَسُولٌ مُّبِينٌ [٤٤:١٣]

(उस वक्त) भला क्या उनको नसीहत होगी जब उनके पास पैग़म्बर आ चुके जो साफ़ साफ़ बयान कर देते थे | सूरा 44 =दुख्खान =13

 

وَلَقَدْ فَتَنَّا قَبْلَهُمْ قَوْمَ فِرْعَوْنَ وَجَاءَهُمْ رَسُولٌ كَرِيمٌ [٤٤:١٧]

और उनसे पहले हमने क़ौमे फिरऔन की आज़माइश की और उनके पास एक आली क़दर पैग़म्बर (मूसा) आए | सूरा 44 दुख्खांन =17

 

أَنْ أَدُّوا إِلَيَّ عِبَادَ اللَّهِ ۖ إِنِّي لَكُمْ رَسُولٌ أَمِينٌ [٤٤:١٨]

(और कहा) कि ख़ुदा के बन्दों (बनी इसराईल) को मेरे हवाले कर दो मैं (ख़ुदा की तरफ से) तुम्हारा एक अमानतदार पैग़म्बर हूँ | सूरा 44 दुख्खान =18

بَلْ مَتَّعْتُ هَٰؤُلَاءِ وَآبَاءَهُمْ حَتَّىٰ جَاءَهُمُ الْحَقُّ وَرَسُولٌ مُّبِينٌ [٤٣:٢٩]

बल्कि मैं उनको और उनके बाप दादाओं को फायदा पहुँचाता रहा यहाँ तक कि उनके पास (दीने) हक़ और साफ़ साफ़ बयान करने वाला रसूल आ पहुँचा | सूरा 43 ज़ुखरफ 29

وَلِكُلِّ أُمَّةٍ رَّسُولٌ ۖ فَإِذَا جَاءَ رَسُولُهُمْ قُضِيَ بَيْنَهُم بِالْقِسْطِ وَهُمْ لَا يُظْلَمُونَ [١٠:٤٧]

और हर उम्मत का ख़ास (एक) एक रसूल हुआ है फिर जब उनका रसूल (हमारी बारगाह में) आएगा तो उनके दरमियान इन्साफ़ के साथ फैसला कर दिया जाएगा और उन पर ज़र्रा बराबर ज़ुल्म न किया जाएगा | सूरा 10 युनुस =47

إِنِّي لَكُمْ رَسُولٌ أَمِينٌ [٢٦:١٧٨]

मै तो बिला शुबाह तुम्हारा अमानदार हूँ | सूरा 26 शुयरा 178

إِنِّي لَكُمْ رَسُولٌ أَمِينٌ [٢٦:١٦٢]

मै तो यक़ीनन तुम्हारा अमानतदार पैग़म्बर हूँ तो ख़ुदा से डरो  | सूरा 26 शुयरा= 162

 

इस प्रकार एकेश्वरवाद कहते हों इस्लाम के मानने वाले किन्तु इसलाम में एकेश्वरवाद कहीं नहीं है जहाँ अल्लाह का नाम है उसी में मुहम्मद का नाम जुड़ा है कलमा सिर्फ अल्लाह के नाम से नहीं है किन्तु मुहम्मद का नाम भी कलमा में लगा हुवा है |

 

यह बात जरदुश्तियों में भी है उन्हों ने भी एकेश्वरवाद को अपनाया यह भी अपनी पुस्तकों में लिखते हैं = बनाम यजदा बखशिशगरदादार { साथ नाम यजदान केजो बखशीश करनेवाला और देनेवाला है }

उपर्युक्त बातें सिद्ध करने के लिए पर्याप्त हैं की इसलाम मत ने प्रायः समस्त धार्मिक विचार और शिक्षाएँ अधिकांश में यहूदियों और कुछ अंश जरदुश्तियों से और बाइबिल से ग्रहण की है | अतएब कुरान का कोई नवीन ईश्वरीय ज्ञान अथवा ईश्वर की किसी विशेष आज्ञा के प्रचार का दावा नहीं कर सकता | अगर इसलाम के मानने वाले यह कहें की कुरान का एकेश्वरवाद यहूदी व् ईसाई मत से भी पवित्र और उत्तम है | और जरदुश्ती मत के विषय में तो कुछ कहना ही नहीं, क्यों की वह दो ईश्वरों में विश्वास रखने के कारन कदापि एक ईश्वरवादी नहीं हो सकता |

इसमें संदेह नहीं की ईसाईयों का ईश्वर विषयक विचार कई बातों में मुसलमानी विचारों से बढ़कर है | ईसाई लोग कुरान के खुदा के अपेक्षा अपने ईश्वर को अधिक धर्मप्रिय और दयालु,अधिक पवित्र,और अधिक प्रेम करनेवाला मानते हैं | दूसरी बातों में निसंदेह ईसाइयों का ईश्वरवाद कुरान की आस्तिकता से घटिया है | ईसाईमत ईश्वरत्व में तीन आत्माओं [trinity ] की शिक्षा देता है, जिसको वास्तव में तीन ईश्वरों में विश्वास करना समझना चाहिए | इस बात में ईसाईमत की अपेक्षा कुरान एक ईश्वर की उपासना करने का अधिक दृढ़तापूर्वक उपदेश देता है | परन्तु यह समझना कठिन है की यहूदियों की अपेक्षा इसलाममत में ईश्वर विषयक क्यों कर उत्तम है, क्यों की यह दोनों ही मत समान रूपसे एक ईश्वरवादी अथवा दो शक्तिवादी विचारधारा पर आस्थावान हैं | एक गॉड परमात्मा, और दूसरा शैतान जिसे ईश्वर के समान मान कर दोनों ने एक ही मान्यता का उजागर किया है |

यहूदियों का जेहोवा जो मनुष्य के गुण वाला है बदला लेने वाला, कुरान के अल्लाह जैसा पूर्ण सदृश्य रहता है | जो एक असहिष्णु स्वेच्छाचारी सम्राट के समान कहीं सातवां आसमान पर तो कोई चौथा आसमान पर विराजमान है | और काफिरों के साथ धर्म युद्ध करने और उनका संहार करने की आज्ञा देता हैं |

जरदुश्हतीमत, यहूदीमत, ईसाईमत, और इस्लाममत, आस्तिकवाद से किसी भी प्रकार से एक दुसरे से घटकर नहीं है | हम यह भी कहेंगे निःसंदेह अहुरामजदा का विचार कुरान और बाइबिल के ईश्वर बिषयक विचार का वास्तविक मूल रूप है |  एक ईश्वरवाद के विचार में इस्लामिक शिक्षा का गौरव् इस लिए अवश्य है की हज़रत मुहम्मद साहब ने उस समय के बिगड़े हुए ईसाईमत या उन अरब निवासियों की बहुदेव पूजा का विरोध किया जिनमें वह स्वयं जन्मे थे | मुहम्मद साहब के समकालीनों के विचारों से उनकी शिक्षा कितनी ही उत्तम क्यों न समझी जाये, परन्तु कुरान का ईश्वरवाद यहूदियों के ईश्वरवाद से अधिक श्रेष्ट नहीं कहा जा सकता |अतएव कोई यह कहे की कुरान की ईश्वर विषयक शिक्षा यहूदी और जरदुशती ईश्वरवाद से अधिक उत्तम है इस लिए कुरान का ईश्वरवाद स्वतंत्र ज्ञान है यह सिद्ध नहीं हो सकता | कुरान में अल्लाह के नाम के साथ साथ मुहम्मद का नाम जुड़ा है जो अन्य मजहब में नहीं है |

 

|| बौद्ध, ईसाई मतों में समान उपदेश, जो वैदिक है ||

 

{1} बौद्ध और ईसाई मतों में उपदेश की समानता, जो वैदिक मान्यता ही है, जो सृष्टि के प्रथम से.ऋषि मुनियों के द्वारा मानव मात्र को यह उपदेश मिला है |

बुद्ध मत का उपदेश है = अरे मुर्ख ! इन जटाओं और मृगछाला धारण से क्या लाभ है ? तेरा अन्तः करण मलिन है पर बाहर से स्वच्छ्ता का आडम्बर बनाये हुए है | { धम्मपद 394 बुद्धग्रन्थ }

 

{1} ईसाई= धर्मग्रन्थ लेखक और पारसियों तुम पर शोक होता है क्यों की तुम सफेदी से पुती हुई उस कब्र के अनुसार हो, जो बाहर तो सुन्दर दिखाई देती है परन्तु भीतर मृतकों की अस्थियों तथा अन्य मलिन वस्तुओं से परिपूर्ण है |{ मति का इन्जील =23 /27 }      प्रभु ने उससे कहा ए फेरिसो तुम प्याले और तश्तरियों को तो बाहर से साफ़ करते हो परन्तु तुम्हारा अंतःकरण लुट खसोट और धुर्त्ताता ओं से भरा हुआ है |

 

{2} बुद्ध = द्वेष से कदापि दूर नहीं होता प्रत्युत वह प्रेम से दूर होता है | उसका वही स्वाभाव है, हमें आनन्द पूर्वक रहना चाहिए, जो हमसे विरोध करे, हमें उनसे विरोध न करना चाहए | हमसे द्वेष करते हैं उनके मध्य रहते हुए भी हमें द्वेष से दूर रहना चाहिए | क्रोध पर प्रेम से और बुराई पर भलाई से विजय प्राप्त करनी चाहिए |  { धम्मपद 5 /197 ,223 }

 

{2} ईसाई = परन्तु मैं तुमसे कहता हूँ कि तुम अपने शत्रुओं से प्रेम करो और अशुभचिंतकों को आशीर्वाद दो |  जो तुमसे घृणा करे उसका साथ भलाई करो जो तुमसे बैर करे या कष्ट पहुंचावें उनके लिए प्राथना करो |  { मत्ति 5 /44 }

 

{3} बुद्ध = जीव हिंसा हत्या करना काटना बांधना, असत्य भाषण, छल कपट, निरर्थक पुस्तकों का पाठ, परस्त्रीगमन अदि पाप मनुष्य को पतित करता है | { सुत्त निपात अनिगन्धसुत्त }

 

{३} ईसाई = क्यों की कुविचार हत्याकांड, चौरकर्म, असत्य साक्षी तथा ईश्वर के प्रति कुवाक्य आदि बातें हृदय से ही उत्पन्न होती है,और यही बातें मनुष्य को पतित करती है | { मत्ती 15 /19-20 }

 

{4} बुद्ध = जो मनुष्य तदनुसार कार्य नहीं करता उसकी चिकनी चूपड़ी. निरर्थक बातें गन्धहींन, सुन्दर रंग वाले पुष्प के समान हैं |  { धम्मपद 51 }

 

{4} ईसाई = तुम्हारे लिए ये जो कुछ भी आदेश करें, उसे मानते हुए तदानुसार कार्य करो, परन्तु तुम उनके से कर्म न करो क्योंकि वह कहते तो हैं परन्तु करते नहीं |   { मत्ती 23/ 3 }

 

{5} बुद्ध = सब मनुष्य दण्ड से काँपते हैं और जीवन से प्रेम करते हैं, स्मरण रखो तुम भी उन्ही के सदृश्य हो | न तुम स्वंम हिंसा करो न हत्या कराओ |   { धम्मपद 130 -1 }

इस प्रकार धर्म चला है वेद से, यहाँ से हटते हटते, सभी मत बने गये और अपनी अपनी बातों लोगों के सामने रखकर एक अलग मत बनालिया है | किन किन की मान्यता क्या है मैंने उनकी पुस्तको से ले कर आप लोगों के सामने रखा है आप लोग बिचार कर सत्य को धारण और असत्य का वर्जन करें | धन्यवाद के साथ =महेंद्र पाल आर्य =वैदिक प्रवक्ता =3 =5 =18 =