कुरान का प्रारम्भ ||

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|| अब हम कुरान की एक,एक,आयातों को देखते हैं ||

मैंने पहले ही लिखा, कुरान के आयातों के उतरने में इस्लाम जगत के विद्वानों में एक दुसरे से मतभेद है, किसीने कहा प्रथम सूरा अल्लाह ने उतारी जिसका नाम सूरा फातिहा है |

जो निम्न प्रकार है  >       Sura: Al-Faatiha

(1) بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَٰنِ الرَّحِيمِ [١:١]

अल्लाह के नाम से जो रहमान व रहीम है।

الْحَمْدُ لِلَّهِ رَبِّ الْعَالَمِينَ [١:٢]

तारीफ़ अल्लाह ही के लिये है जो तमाम क़ायनात का रब है।

الرَّحْمَٰنِ الرَّحِيمِ [١:٣]

रहमान और रहीम है।

مَالِكِ يَوْمِ الدِّينِ [١:٤]

रोज़े जज़ा का मालिक है।

إِيَّاكَ نَعْبُدُ وَإِيَّاكَ نَسْتَعِينُ [١:٥]

हम तेरी ही इबादत करते हैं, और तुझ ही से मदद मांगते है।

اهْدِنَا الصِّرَاطَ الْمُسْتَقِيمَ [١:٦]

हमें सीधा रास्ता दिखा।

صِرَاطَ الَّذِينَ أَنْعَمْتَ عَلَيْهِمْ غَيْرِ الْمَغْضُوبِ عَلَيْهِمْ وَلَا الضَّالِّينَ [١:٧]

उन लोगों का रास्ता जिन पर तूने इनाम फ़रमाया, जो नहीं हुए, जो भटके हुए नहीं है।

 

नोट :- इसपर हम इस्लाम जगत के विद्वानों के विचार को प्रथम देखते हैं,कुरान का हिन्दी अनुवादक मौलाना फारुख खान के विचार निम्न प्रकार हैं |

इस सूरा का नाम अल-फातिहा, फातिहा उस चीज को कहते हैं जिससे किसी विषय या पुस्तक का अथवा किसी विषय का उद्घाटन हो | दुसरे शब्दों में यूँ समझें की यह नाम भूमिका, प्राक्कथन के अर्थ में हो |

इस का अवतरण काल :

यह हजरत मुहम्मद {स} के नबी होने के बिलकुल प्रारंभिक काल की सूरा है | बल्कि विश्वासनीय कथनों से मालूम होता है, कि सबसे पहली पूर्ण सूरा जो हजरत मुहम्मद {स} पर अवतरित हुई वह यही है | इससे पहले केवल कुछ विविध आयतें उतरीं थीं, जो सूरा 96 {अलक} सूरा 73 {मुजम्मिल} सूरा 74 {मुदस्सिर} आदि में सम्मिलित हैं |

 

 

 

{ पृष्ट 2 }

नोट:- गम्भीरता से सोचने और समझने की बातें यह है की इस्लाम जगत जिन्हें विद्वान कहते हैं मानते भी हैं | क्या यही विद्वता है इन विद्वानों की ? की अपने विचारों का विरोध अपने ही लेखनी से करें ? वह भी पुस्तक के प्रारम्भ में | देखें क्या लिखा है > सबसे पहली पूर्ण सूरा जो हजरत मुहम्मद {स} पर अवतरित हुई वह यही है | यहाँ सबसे पहले शब्द लिखा है= अर्थात इससे पहले का अर्थ है इससे पहले कोई और नहीं |

अब अगर यह कहा जाय की इससे पहले, तो सबसे पहले का तात्पर्य क्या है ? अर्थात प्रथम से ही सवालों के घेरे में हैं यह कुरान, और कुरान के जानकार कहलाने वाले लोग |

 

ऋषि दयानन्द जी ने कुरान पर जो सवाल उठाया है वह भी इसी कुरान की आरंभिक शब्द पर ही उठाया है | वह क्या है देखें > स्वामी जी ने लिया है इसे मौलाना शाह रफ़ी अहमद जी से जिन्हों ने कुरान का अनुबाद किया है | यही वह सूरा का प्रथम आयत है सूरा फातिहा जिसे कहा है | इसमें सात {7} आयात है कुरान को खोलते ही लिखा है देखेंगे, सूरा अल फातिहा मकियातुं व हिया सबयु आयातीं | यह वाक्य अरबी में लिखा है इसका अर्थ है { अल फातिहा मक्का में उतरी इसमें सात आयात है }

بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَٰنِ الرَّحِيمِ [١:١]

अर्थ :-प्रारम्भ करता हूँ मैं साथ नाम अल्लाह के, जो बख्शने वाला, और दयालू है |

नोट :- उपर देख रहे हैं कोष्टक में [1:1] लिखा यह इसका तात्पर्य है सूरा 1 का आयात1 है, अर्थात कोई यह ना कह सके की यह वाक्य कुरान का नहीं है | इस आयात को गिनकर ही इसी सूरा के 7 आयात होते हैं | इसे अगर छोड़ दें, तो आयात 6 होंगे | इसके आरम्भ में लिखा है इस सूरा में सात {7 } आयात हैं | अगर इस को हटा दें तो सूरा के 7 आयत पुरे नहीं होंगे |

ऋषि दयानन्द जी ने इसकी प्रारम्भिक शब्द को ही गलत सिद्ध किया है, की कुरान का बिस्मिल्ला ही गलत है | आगे चले, दूसरी आयत में क्या कहा है अल्लाह ने |

الْحَمْدُ لِلَّهِ رَبِّ الْعَالَمِينَ [١:٢]

तारीफ़ अल्लाह ही के लिये है जो तमाम क़ायनात का रब है।

प्रशंसा अल्लाह ही के लिए हैं जो तमाम {सम्पूर्ण} कायनात {संसार} का रब {मालिक} है |

 

 

الرَّحْمَٰنِ الرَّحِيمِ [١:٣]

रहमान और रहीम है।

जो दयावान और कृपालु है |

प्रशन उठता है की अल्लाह किसपर दया करता है और उसकी कृपा किसपर है ?

 

 

पृष्ट {3}

इधर वेद में जिन्हें परमात्मा कहा गया, जिसका स्वाभाविक गुण है जीवों पर दया करना | किन्तु कुरान के आयत तीन {3 } से ज्ञात हुवा की अल्लाह सभी जीवों पर दया नहीं करते,

 

 

अगर सभी जीवों पर दया करते तो इसलाम के मानने वाले मुसलमान जिस जीव के गले में छुरी चला रहे हैं अथवा जिस पशु की क़ुरबानी दे रहे हैं | उस पर अल्लाह की दया नहीं है ? कारण दया अल्लाह करते तो उसे काटने में मानव समर्थ कैसे होते ? अथवा मानवों को यह ज्ञान होता की अल्लाह की दया इस पशु पर है हमें इसे काटना नहीं चाहिए |

 

आश्चर्य की बात इसमें एक और है की जिस किसी पशु को मुसलमान या इस्लाम के मानने वाले लोग काटते है उस पशु को, अल्लाह का नांम ले कर ही काटते हैं | आगे देखें =

مَالِكِ يَوْمِ الدِّينِ [١:٤]

रोज़े जज़ा का मालिक है।

अर्थात कयामत के दिन का मालिक प्रलय के दिन का मालिक, हिसाब, किताब के दिन का मालिक |

नोट :- अगर वह विशेष एक दिन के मालिक हैं, इससे स्पष्ट यह हुवा की वह सदा सर्वदा के मालिक नहीं है ?अगर हर दिन के मालिक होते, तो एक विशेष दिन का मालिक नहीं बताया जाता |

إِيَّاكَ نَعْبُدُ وَإِيَّاكَ نَسْتَعِينُ [١:٥]

हम तेरी ही इबादत करते हैं, और तुझ ही से मदद मांगते है।

नोट :- इस वाक्य में अल्लाह ने कहा हम तेरी इबादत{ उपसना} करते हैं, इस वाक्य से पता लगा की अल्लाह कोई मानव है ? कारण इबादत के लायक {योग्य} सिर्फ और सिर्फ मानव ही हैं, धरती पर कोई और प्राणी नहीं जो, इबादत या उपासना कर सकें ? एक बात यह भी है की मानव अगर उपसना करता है तो ईश्वर की उपासना करता है | कारण ईश्वर को छोड़ कोई और पूजने  के लायक ही नहीं |  अब प्रश्न है की इस्लाम वाले जिस अल्लाह को उपासना ले लायक {योग्य} मानते है, की अल्लाह को छोड़ और किसी की उपासना नहीं करना चाहिए | अब वही अल्लाह ही कह रहे हैं हम तेरी इबादत {उपासना} करते हैं | अल्लाह किस अल्लाह की उपासना करते हैं ?

 

यही कारण ऋषि दयानन्द जी ने लिखा है की एक अल्लाह दुसरे अल्लाह के नाम से शुरू किया है इस कुरान को | यहाँ भी वही बात आ गई सामने की एक अल्लाह दुसरे अल्लाह की उपासना करते हैं | अगला शब्द से और स्पष्ट हो गया, की अल्लाह ने कहा और तुझ ही से

 

पृष्ट {4}

मदद मांगते हैं | दुनिया में मानव कहलाने वाले अल्लाह से मदद मांगते हैं, यहाँ अल्लाह ही दुसरे अल्लाह से मदद मांग रहे हैं | जब की दुनिया वाले कहते हैं अल्लाह के सिवा और कोई मददगार नहीं है,यहाँ अल्लाह ही मदद मांग रहे हैं |

 

 

اهْدِنَا الصِّرَاطَ الْمُسْتَقِيمَ [١:٦]

हमें सीधा रास्ता दिखा।

इस आयत पर भी ध्यान देना चाहिए, यहाँ अल्लाह ने कहा हमें सीधा रास्ता दिखा | यह वाक्य अल्लाह का क्यों और कैसे होना संभव है ? मानव समाज या मानव कहलाने वाले अल्लाह से ही गुहार लगाते हैं की हमें सीधा रास्ता दिखा | पर यह कुरान में अल्लाह ने  खुद कहा हमें सीधा रास्ता दिखा, यह वाक्य भी अल्लाह के नहीं है अल्लाह कोई और है जिससे सीधा रास्ता दिखाने की बात कही गई |  इस बात से स्पष्ट हुवा की यह कलाम {वाक्य} अल्लाह के नहीं हैं, यह सवालों के घेरे में है कुरान | जो भटका हुवा होगा उसे सीधा रास्ता चाहिए | अगर यह कलाम {वाक्य} खुदा या अल्लाह का है तो वह अल्लाह या खुदा किस से सीधा रास्ता देखना चाहते हैं ?

 

सीधा रास्ता उसे चाहिए जो उलटे रस्ते पर हों या गलत रस्ते पर होंगे उन्हें सीधा रास्ता चाहिए ? और सीधा रास्ता दिखाता कौन है वह सिर्फ परमात्मा है, जो सीधा रास्ता दिखाने वाला | रही बात अल्लाह की तो अल्लाह मुसलमानों को छोड़ गैर मुस्लिमों से नरक {दोजख} भरेंगे तो उन गैरमुस्लिमों को अल्लाह सीधा रास्ता दिखाते नहीं |

पर बात यहाँ तो अल्लाह खुद कह रहे हैं हमें सीधा रास्ता दिखा, तो यह वाक्य कहने वाला अल्लाह का होना क्यों और कैसे संभव होगा ? जिसे इस्लाम वाले कलामुल्लाह कह रहे हैं उसी अल्लाह कि कलाम में,  जिसे अल्लाह कहा गया माना गया वही अल्लाह ही सीधा रास्ता मांग रहे हैं | यहाँ भी रास्ता सीधा मांगने वाला कोई और है और रास्ता दिखाने वाला भी कोई और ही है जिससे सीधा रास्ता दिखाने को कहा जा रहा है |

صِرَاطَ الَّذِينَ أَنْعَمْتَ عَلَيْهِمْ غَيْرِ الْمَغْضُوبِ عَلَيْهِمْ وَلَا الضَّالِّينَ [١:٧]

उन लोगों का रास्ता जिन पर तूने इनाम फ़रमाया, जो माअतूब नहीं हुए, जो भटके हुए नहीं है।

 

देखें यहाँ भी अल्लाह ही कह रहे हैं उन लोगों का रास्ता दिखा जिनपर तूने इनाम फरमाया, उन लोगों का रास्ता ना दिखा जिनपर तूने गजब ढाया { अभिशाप} दिया | जो भटके हुए नहीं थे, या है |

 

पृष्ट {5}

यहाँ भी स्पष्ट है की यह कलाम अल्लाह के नहीं हैं, यह उनलोगों के रस्ते पर चलना चाह रहे हैं जिन लोगों पर अल्लाह ने रहम किया, दया किया जो भटके हुए नहीं थे जिनपर गजब

नहीं किया था अल्लाह ने | यहाँ अगर मान लिया जाए की यह कुरान कलामुल्लाह है तो भी इन बातों से स्पष्ट है की यह शब्द {वाक्य} अल्लाह के या खुदा के नहीं है, जो अल्लाह से

कह रहे हैं, की हमें उन लोगों के रस्ते पर ना चला, जिसपर तू ने अभिशाप किया है | अथवा जिनलोगों पर तेरा अभिशाप हुवा है | हमें उन लोगों के रस्ते से बचा देना या बचाए रखना |

 

नोट:- यहाँ जो विचारणीय बात है वह यह है की, जो सृष्टि कर्ता है उसे भी कुरानी अल्लाह ने नहीं जाना, अथवा नहीं जान पाया | देखें वेद में जिस परमात्मा की चर्चा है जिसे दुनिया बनाने वाला कहा और माना है | परमात्मा का उपदेश है की मानव कर्म करने में स्वतन्त्र है और फल भोगने में प्रतन्त्र है, मानव को परमात्मा ने बुद्धि दिया है वह अपने आप में विचारवान है अपनी अक्ल से काम ले,किन्तु फल अपने आप नहीं ले सकता,यहाँ कर्म फल डाता का नाम परमात्मा बताया है | अब सीधा रस्ते पर चलना यह विचार शील मानवों का कामहै मानवों को कोई हाथ पकड़ कर नहीं चलाएगा उसे चलना होगा सत्य और असत्य को जान कर समझ कर | वैदिक मान्यता है सब काम धर्मानुसार, सत्य और असत्य को विचार करके करना है |

अब रास्ता सीधा है अथवा नहीं इस पर विचार कर के मानवों को ही चलना है, यहाँ अल्लाह से ही कहा जा रहा है हमें सीधा रास्ता दिखा सीधा रास्ते पर चला | बड़ी बात यह है की यह वाक्य कौन कह रहा है ? लोग जिसे अल्लाह कह रहे हैं, उन्ही अल्लाह को सीधा रास्ता चाहिए | जिस अल्लाह को सीधा रास्ता चाहिए किसी और से जो, सीधा रास्ता मांग रहे हों वह अल्लाह क्यों और कैसे हो सकते हैं ? यह सबसे बड़ा प्रश्न है ?

 

नोट :- जिस कुरान को कलामुल्लाह कहा जा रहा है, जिसके प्रथम सूरा या उसकी यह आयत जो सात बताया गया है जिन सात आयातों को उपर दर्शाया गया, जिसे इस्लाम के विद्वानों ने भी इसे प्रथम सूरा कहा जिसे कलामुल्लाह बताया गया है

जब यह कलाम ही अल्लाह के हैं तो किस अल्लाह के नाम से शुरू किया ? किस अल्लाह की प्रंशाषा की जा रही है ? किसे दुनिया जहाँन का मालिक बताया जा रहा है ? कौन है वह रहम करने वाला दयालु ? जो प्रलय के दिन के मालिक हैं, जिससे यह सभी मदद की माँग की जा रही है |

जिसकी इबादत की जारही हैं जिससे सीधा रास्ता दिखाने को कहा जा रहा है, उससे यह भी कहा जा रहा है की हमें भटके हुए लोगों के रस्ते पर ना चला, उन लोगों के रस्ते पर चला जिस पर तूने दया किया है | यह सब कहने वाला अल्लाह क्योंकर हो सकता है ? तथा यह

 

 

पृष्ट {6}

किताब कला मुल्ला ईश्वरीय, दैवीय वाणी क्यों और कैसे हो सकता है ?  जिस पुस्तक की प्रारंभ में ही सवाल खड़ा है उसे ईश्वरीय ज्ञान मान कह कर ईश्वर पर भी दोष लगाया गया

है हम मानव होने हेतो मनुष्य मात्र को उचित है ईश्वरीय ज्ञान को हमें तर्क के तराजू पर तौलते हुए बुद्धि का ठीक ठीक प्रयोग करें और मानव कहलाने का अधिकारी बनें |

 

कुरान का प्रथम सूरा यहीं तक समीक्षा के साथ समाप्त हुवा = अब दूसरा सूरा लिखा जाएगा | जो सूरा बकर नाम है जो सब से बड़ा है |