ऋषि दयानंद जी ने अपने अमर ग्रन्थ सत्यार्थ प्रकाश के अंत में, स्वमत्वव्यामन्तव्यप्रकाश प्रकरण में धर्म और अधर्म को समझाते हुए लिखते है : “धर्माधर्म” जो पक्षपातरहित, न्यायाचरण, सत्यभाषादियुक्त ईश्वराज्ञा,

सृष्टि के प्रथम से ही अनेकों महापुरुषों का आगमन हुवा अनेकों ऋषि महर्षि, और ऋषिकायें इसी धरती पर आयें, अनेकों मुनियों का भी आगमन हुवा,फिर महा पुरुष भी आयें,सबने मानवता

हम भारत वासियों ने सत्य को स्वीकार ही कहाँ किया ? हमें जो पाठगलत पढाया गया आज तक उसी को हम रटे जारहे हैं, उसे सुधार ने का प्रयास कभी



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